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महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल: उद्धव गुट के सांसदों के शिंदे खेमे में जाने की अटकलें, ‘वीडियो में जाने ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा तेज 

महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल: उद्धव गुट के सांसदों के शिंदे खेमे में जाने की अटकलें, ‘वीडियो में जाने ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा तेज

महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर बड़ा राजनीतिक तनाव देखने को मिल रहा है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के भीतर दरार की अटकलें तेज हो गई हैं, जिसमें दावा किया जा रहा है कि पार्टी के 9 लोकसभा सांसदों में से करीब 6 से 7 सांसद शिंदे गुट की Shiv Sena में शामिल हो सकते हैं। हालांकि इस पर अभी तक किसी भी सांसद या पार्टी की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

इस राजनीतिक हलचल के बीच उद्धव ठाकरे गुट ने गुरुवार को दिल्ली में अपनी संसदीय समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। पार्टी नेतृत्व ने सभी सांसदों को व्हिप जारी कर इस बैठक में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं। पार्टी की ओर से साफ संकेत दिया गया है कि जो सांसद बैठक में शामिल नहीं होंगे, उनके खिलाफ दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता यानी डिस्क्वालिफिकेशन की कार्रवाई की जा सकती है।

यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं। इससे पहले 2022 में भी इसी तरह की स्थिति बनी थी, जब शिवसेना में बड़े पैमाने पर बगावत हुई थी। उस दौरान Eknath Shinde के नेतृत्व में 39 विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग होकर सरकार के समीकरण को बदल दिया था। इसके बाद लंबे राजनीतिक और कानूनी संघर्ष के बीच अयोग्यता की कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू हुई थी।

राजनीतिक गलियारों में इस मौजूदा घटनाक्रम को “ऑपरेशन टाइगर” नाम दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि यह नाम शिवसेना के पारंपरिक प्रतीक और संगठनात्मक शक्ति को ध्यान में रखते हुए इस्तेमाल किया जा रहा है, हालांकि इस नाम को लेकर किसी आधिकारिक पुष्टि या बयान की घोषणा नहीं हुई है।सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व को डर है कि यदि सांसदों की संभावित बगावत की खबरें सही साबित होती हैं, तो यह लोकसभा में उद्धव गुट की राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। इसी कारण व्हिप जारी कर बैठक में उपस्थिति को अनिवार्य बनाया गया है, ताकि पार्टी अपने सांसदों की स्थिति स्पष्ट कर सके।

वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र में शिवसेना के दोनों गुटों के बीच चल रहा यह संघर्ष केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि आगामी चुनावी रणनीति और सत्ता संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। 2022 के बाद से दोनों गुट लगातार अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में लगे हुए हैं, और लोकसभा स्तर पर संभावित बदलाव इस संघर्ष को और तीखा बना सकता है।

फिलहाल इस पूरे मामले पर राजनीतिक माहौल गर्म है और सभी की नजर दिल्ली में होने वाली बैठक और सांसदों की उपस्थिति पर टिकी हुई है। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि अटकलें सिर्फ राजनीतिक चर्चाएं हैं या वास्तव में महाराष्ट्र की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव सामने आने वाला है।

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