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शिवसेना के धनुष-बाण विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल, दोनों गुटों को अलग चुनाव चिह्न देने का विकल्प क्यों नहीं?

शिवसेना के धनुष-बाण विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल, दोनों गुटों को अलग चुनाव चिह्न देने का विकल्प क्यों नहीं?

शिवसेना के नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अहम सवाल उठाया गया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने चुनाव आयोग के उस फैसले पर सवाल किया, जिसमें एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न दिया गया था। अदालत ने पूछा कि अगर उपलब्ध कसौटियों के आधार पर किसी एक गुट को स्पष्ट रूप से चुनना मुश्किल था, तो दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न चुनकर अपने दम पर चुनाव लड़ने का विकल्प क्यों नहीं दिया गया।

कोर्ट ने चुनाव आयोग के विकल्प पर उठाया सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि अगर पार्टी की पहचान तय करने के लिए इस्तेमाल की गई सभी कसौटियां विवादित या अपर्याप्त मानी जा रही थीं, तो चुनाव आयोग के पास दोनों पक्षों को मूल चुनाव चिह्न से अलग रखने का विकल्प भी था। अदालत ने सवाल किया कि दोनों गुटों को अपने-अपने चुनाव चिह्न चुनकर अपनी राजनीतिक ताकत के आधार पर चुनाव लड़ने के लिए क्यों नहीं कहा गया।

यह सुनवाई 2022 में शिवसेना में हुए विभाजन से जुड़े मामलों पर हो रही है। उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न दिया गया था।

शिंदे गुट ने फैसले का किया बचाव

सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि आयोग ने संगठनात्मक ढांचे और विधायकों के समर्थन समेत उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद विधायी बहुमत को महत्वपूर्ण कसौटी माना था।

कौल के मुताबिक, 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के 55 विजयी विधायकों में से 40 विधायक शिंदे गुट के साथ थे, जबकि 15 विधायक ठाकरे गुट के समर्थन में थे। उन्होंने लोकसभा में भी शिंदे गुट के साथ अधिक सांसद होने का आंकड़ा अदालत के सामने रखा।

विधायकों की अयोग्यता पर भी चर्चा

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब संबंधित विधायकों की अयोग्यता से जुड़ी कार्यवाही लंबित थी, तब पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर फैसला करने के लिए विधायी बहुमत को कितनी सुरक्षित कसौटी माना जा सकता है। अदालत ने राजनीतिक दल और उसके विधायी दल के बीच अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया।

वहीं, ठाकरे गुट का कहना है कि विधायकों की संख्या के आधार पर किसी गुट को पार्टी की पहचान और चुनाव चिह्न का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। दूसरी ओर, शिंदे गुट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया को उचित ठहराया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस विवाद पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। मामले में आगे की सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के फैसले और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं पर अदालत में दलीलें जारी रहेंगी।

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