महाराष्ट्र MLC चुनाव में महायुति और MVA में बगावत, असंतुष्ट नेताओं ने अपनों के खिलाफ भरा पर्चा
महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव में सत्ताधारी महायुति और विपक्षी महाविकास अघाड़ी यानी MVA, दोनों गठबंधनों में अंदरूनी खींचतान सामने आई है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख समाप्त होते ही दोनों खेमों के कुछ असंतुष्ट नेताओं ने अपने ही दलों के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ नामांकन दाखिल कर दिया। इससे चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ उतरे असंतुष्ट नेता
नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद सामने आई तस्वीर से स्पष्ट है कि दोनों गठबंधनों के भीतर सभी नेता आधिकारिक उम्मीदवारों के चयन से सहमत नहीं हैं। टिकट नहीं मिलने या उम्मीदवारों के चयन को लेकर नाराज नेताओं ने निर्दलीय या अलग समीकरणों के साथ चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है।
इस बगावत के कारण पार्टियों के सामने अपने ही खेमे के असंतुष्ट नेताओं को मनाने की चुनौती खड़ी हो गई है। अब नाम वापसी की प्रक्रिया के दौरान बागी उम्मीदवारों को पीछे हटाने के लिए बातचीत की कोशिशें भी तेज हो सकती हैं।
महायुति के सामने भी चुनौती
सत्ताधारी महायुति में शामिल दलों के कुछ नेताओं के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ मैदान में उतरने से गठबंधन के भीतर समन्वय पर सवाल खड़े हुए हैं। पार्टियों के सामने अब बागी उम्मीदवारों को लेकर रणनीति तय करने की चुनौती है।
चुनाव में यदि असंतुष्ट उम्मीदवार मैदान में बने रहते हैं तो आधिकारिक प्रत्याशियों के लिए अपने समर्थकों और गठबंधन के मतों को एकजुट रखना महत्वपूर्ण होगा।
MVA में भी बढ़ी मुश्किल
विपक्षी MVA में भी स्थिति अलग नहीं है। गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ असंतुष्ट नेताओं के नामांकन दाखिल करने से विपक्षी खेमे में भी अंदरूनी चुनौती सामने आई है।
अब दोनों गठबंधनों की नजर नाम वापसी की प्रक्रिया पर है। पार्टियां कोशिश कर सकती हैं कि बागी उम्मीदवारों को समझाकर चुनाव मैदान से हटाया जाए और गठबंधन के आधिकारिक प्रत्याशियों के समर्थन में सहमति बनाई जाए।
नाम वापसी के बाद साफ होगी तस्वीर
नामांकन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब चुनावी तस्वीर नाम वापसी की प्रक्रिया के बाद और स्पष्ट होगी। कौन से बागी उम्मीदवार मैदान में बने रहते हैं और कौन वापस हटते हैं, इसका असर अंतिम मुकाबले पर पड़ेगा।
फिलहाल महायुति और MVA दोनों के सामने अपने-अपने खेमे में असंतोष को संभालने और आधिकारिक उम्मीदवारों के पक्ष में समर्थन बनाए रखने की चुनौती है।

