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कांग्रेस के चहेते से विवादों तक का सफर: सुरेश कलमाड़ी की सियासी कहानी

कांग्रेस के चहेते से विवादों तक का सफर: सुरेश कलमाड़ी की सियासी कहानी

सुरेश कलमाड़ी लंबे समय तक कांग्रेस आलाकमान के प्रिय नेताओं में गिने जाते रहे। उनकी राजनीतिक यात्रा तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ी और उन्हें कम उम्र में ही राष्ट्रीय राजनीति में पहचान मिल गई। महाराष्ट्र युवा कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर उनकी सक्रियता, संगठनात्मक क्षमता और आक्रामक कार्यशैली ने पार्टी नेतृत्व का ध्यान अपनी ओर खींचा। यही वजह रही कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए वर्ष 1982 में ही उन्हें राज्यसभा भेज दिया।

राज्यसभा में पहुंचना किसी भी युवा नेता के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है और कलमाड़ी ने इसे अपनी सियासी सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल किया। इसके बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव भी लड़ा और जीत दर्ज कर संसद के निचले सदन तक पहुंचे। धीरे-धीरे वे कांग्रेस के उन नेताओं में शुमार हो गए, जिनकी गिनती प्रभावशाली और भरोसेमंद चेहरों में होती थी। पार्टी संगठन के साथ-साथ खेल प्रशासन में भी उनकी दखल बढ़ने लगी।

सुरेश कलमाड़ी का राजनीतिक ग्राफ जिस तेजी से ऊपर गया, उतनी ही तेजी से वह विवादों में भी घिरते चले गए। उनके करियर का टर्निंग पॉइंट उस समय आया जब उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। खासतौर पर खेल आयोजनों से जुड़े मामलों में उनका नाम सामने आने के बाद उनकी छवि को गहरा झटका लगा। कभी कांग्रेस के चहेते रहे कलमाड़ी अचानक कटघरे में खड़े नजर आने लगे।

भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही उनकी राजनीतिक साख पर सवाल उठने लगे। पार्टी के भीतर भी उनकी स्थिति कमजोर होती चली गई। जहां कभी आलाकमान का उन्हें पूरा समर्थन मिला करता था, वहीं अब दूरी साफ दिखाई देने लगी। जांच एजेंसियों की सक्रियता और मीडिया की तीखी नजरों ने उनके लिए मुश्किलें और बढ़ा दीं। जनता के बीच भी उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज की गई।

राजनीति में जिस नेता की पहचान तेज़ फैसलों और प्रभावशाली उपस्थिति के लिए होती थी, वही नेता धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया। कांग्रेस के लिए भी यह स्थिति असहज करने वाली थी, क्योंकि कलमाड़ी जैसे वरिष्ठ नेता पर लगे आरोप पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा रहे थे। नतीजतन, पार्टी नेतृत्व ने उनसे दूरी बनाना शुरू कर दिया।

सुरेश कलमाड़ी का राजनीतिक सफर इस बात का उदाहरण है कि भारतीय राजनीति में सफलता जितनी जल्दी मिल सकती है, उतनी ही तेजी से हाथ से फिसल भी सकती है। संगठन की नज़र में प्रिय होना, सत्ता के करीब रहना और अहम पदों पर पहुंचना किसी नेता को ऊंचाई तक ले जा सकता है, लेकिन भ्रष्टाचार जैसे आरोप पूरी राजनीतिक विरासत पर सवाल खड़े कर देते हैं।

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