काम न आया ‘लैला ओ लैला’ पर ठुमके, ‘शालीनता’ वाली शिवसेना को मिली जीत, बीजेपी की उम्मीदें टूटीं
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर यह साफ हो गया है कि चुनावी जीत केवल ग्लैमर, प्रचार और मंचीय शो से तय नहीं होती। हालिया चुनावी नतीजों में जहां एक ओर प्रचार के दौरान फिल्मी गानों और डांस परफॉर्मेंस का सहारा लिया गया, वहीं दूसरी ओर अपेक्षाकृत शांत, शालीन और मुद्दा-आधारित राजनीति करने वाली शिवसेना (शिंदे गुट) को जनता का समर्थन मिला। चुनाव परिणामों ने बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया और यह संदेश दे दिया कि मतदाता अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ठोस नेतृत्व और विश्वसनीयता चाहता है।
चुनावी प्रचार के दौरान कुछ सीटों पर फिल्मी अंदाज में माहौल बनाने की कोशिश की गई। मंचों पर लोकप्रिय गाने, खासतौर पर ‘लैला ओ लैला’ जैसे आइटम नंबरों पर ठुमके, सोशल मीडिया और रैलियों में खूब चर्चा में रहे। माना जा रहा था कि इससे युवा मतदाताओं और भीड़ को आकर्षित किया जा सकेगा, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि यह रणनीति जमीनी स्तर पर असर नहीं दिखा पाई।
इसके उलट, शिवसेना (शिंदे गुट) ने प्रचार में संयम और मर्यादा बनाए रखी। पार्टी ने स्थानीय मुद्दों, प्रशासनिक स्थिरता और विकास के वादों पर फोकस किया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यही “शालीनता” मतदाताओं को पसंद आई। लोगों ने ऐसे नेतृत्व को चुना, जो उन्हें भरोसेमंद और स्थिर नजर आया।
बीजेपी के लिए यह चुनाव कई मायनों में आत्ममंथन का विषय बन गया है। पार्टी को उम्मीद थी कि आक्रामक प्रचार और बड़े आयोजनों के जरिए वह चुनावी समीकरण अपने पक्ष में मोड़ लेगी, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली। कई सीटों पर बीजेपी को कड़ी टक्कर मिली, लेकिन अंत में जीत शिवसेना के खाते में चली गई।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महाराष्ट्र की जनता खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में अब परिपक्व राजनीतिक सोच दिखा रही है। मतदाता प्रचार के शोर-शराबे से ज्यादा उम्मीदवार की छवि, पार्टी की स्थिरता और भविष्य की योजनाओं को तवज्जो दे रहे हैं। यही कारण है कि सतही प्रचार रणनीतियां इस बार प्रभावी साबित नहीं हो सकीं।
शिवसेना (शिंदे गुट) की जीत को पार्टी के लिए बड़ी नैतिक मजबूती माना जा रहा है। इससे यह भी संदेश गया है कि विभाजन के बाद भी पार्टी का एक वर्ग जनता के बीच अपनी पहचान बनाने में सफल रहा है। वहीं बीजेपी के लिए यह हार संकेत है कि उसे भविष्य में प्रचार की रणनीति और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ को और मजबूत करना होगा।
चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टियां अब मनोरंजन आधारित प्रचार से दूरी बनाकर ज्यादा गंभीर और मुद्दा-केंद्रित राजनीति की ओर बढ़ सकती हैं।

