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सुख- समृद्धि और पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है गणगौर का व्रत, 3 मिनट के वायरल वीडियो में जाने इसकी सम्पूर्ण व्रत कथा और महत्त्व 

हिंदू धर्म में गणगौर पर्व का विशेष महत्व है। यह पर्व हर साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं और कुंवारी लड़कियां व्रत रखती हैं और भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से दांपत्य जीवन सुखमय होता है और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वहीं, इस साल गणगौर व्रत आज यानी 31 मार्च को मनाया जा रहा है। वहीं, गणगौर की पूजा करते समय इस व्रत कथा का पाठ करना जरूरी होता है, वरना पूजा अधूरी मानी जाती है। आइए जानते हैं इस व्रत कथा के बारे में...

गणगौर व्रत कथा 2025
एक बार भगवान शिव, माता पार्वती और नारद जी तीनों साथ में भ्रमण के लिए निकले और घूमते-घूमते एक गांव में पहुंचे। यह दिन चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। जैसे ही गांव वालों को उनके आगमन की खबर मिली, सभी लोग भगवान के स्वागत की तैयारी करने लगे। सबसे पहले उस गांव की गरीब महिलाएं थाली में हल्दी और चावल लेकर उनका स्वागत करने पहुंचीं। माता पार्वती प्रसन्न हुईं और उन पर सुहाग रस की वर्षा की। कुछ समय पश्चात धनवान स्त्रियां सोने-चांदी की थाली में तरह-तरह के व्यंजन लेकर सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुंचीं। इन स्त्रियों को देखकर भगवान शिव ने माता पार्वती से पूछा कि तुमने सारा सुहाग रस गरीब स्त्रियों को दे दिया है।

अब तुम उन्हें क्या दोगी? माता पार्वती ने कहा कि मैंने उन स्त्रियों को ऊपरी पदार्थों से बना रस पिला दिया है। अब मैं अपनी उंगली काटकर और रक्त छिड़ककर इन स्त्रियों को सुहाग का वरदान दूंगी। माता पार्वती ने स्त्रियों को आशीर्वाद दिया कि वे वस्त्र, आभूषण और बाह्य मोह का परित्याग कर तन, मन और धन से अपने पति की सेवा करें। उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होगी। इस घटना के पश्चात माता पार्वती भगवान भोलेनाथ से अनुमति लेकर नदी में स्नान करने चली गईं। स्नान के पश्चात माता ने रेत से भगवान शिव की मूर्ति बनाई और उसकी पूजा की। भोग लगाकर और प्रदक्षिणा करके प्रसाद के दो दाने लेकर माथे पर तिलक लगाया। यह सब करने में पार्वती जी को काफी समय लगा। जब वे लौटीं तो महादेव जी ने उनसे विलम्ब का कारण पूछा।

पार्वती जी ने झूठ बोला कि वे वहां अपने मायके वालों से मिलीं। उनसे बात करते-करते उन्हें बहुत देर हो गई। लेकिन महादेव तो महादेव थे। वे सब समझ रहे थे। अतः उन्होंने पूछा- 'पार्वती! नदी के तट पर पूजा करके तुमने क्या भोग लगाया तथा स्वयं क्या प्रसाद खाया?' पार्वती जी ने पुनः झूठ बोला- 'मेरी ननद ने मुझे दूध-भात खिलाया।' यह सुनकर शिव जी ने भी दूध-भात खाने की इच्छा प्रकट की तथा वे नदी की ओर चल पड़े। पार्वती जी दुविधा में पड़ गईं। तब उन्होंने मन ही मन भगवान भोले शंकर का ध्यान किया तथा प्रार्थना की- हे प्रभु! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूं तो कृपया मेरी लाज बचाइए।

यह प्रार्थना करते हुए पार्वती जी भगवान शिव के पीछे-पीछे चलती रहीं। उन्हें नदी के तट पर माया का महल दिखाई दिया। महल के अंदर पहुंचकर उन्होंने देखा कि पार्वती के भाई, भाभी तथा उनके परिवार वहां उपस्थित थे। उन्होंने गौरी तथा शंकर का स्वागत किया। वे वहां दो दिन तक रहे। तीसरे दिन पार्वती ने शिव से जाने का आग्रह किया, परंतु शिव तैयार नहीं हुए। वे और अधिक रुकना चाहते थे। तब पार्वती परेशान होकर अकेली ही चल दीं। यह देखकर भगवान शिव को पार्वती के साथ जाना पड़ा। इस समय नारदजी भी उनके साथ थे। चलते-चलते वे बहुत दूर निकल गए। अचानक भगवान शंकर को याद आया कि वे अपनी माला भूल आए हैं।

माता पार्वती ने कहा कि वे माला लेकर आएंगी। परंतु भगवान ने उन्हें जाने की अनुमति नहीं दी और ब्रह्मा के पुत्र नारदजी को इस कार्य के लिए भेज दिया। नारदजी को वहां कोई महल दिखाई नहीं दिया। नारदजी वहां भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वे गलत स्थान पर तो नहीं आ गए? अचानक नारदजी ने एक पेड़ पर शिवजी की माला टंगी देखी। नारदजी ने माला उतार ली और शिवजी के पास पहुंचे और उन्हें वहां का हाल बताया।

शिवजी हंसकर बोले- 'नारद! यह सब पार्वती की लीला है।' तब नारदजी ने सिर झुकाकर कहा- 'माता! आप पतिव्रता पत्नियों में श्रेष्ठ हैं। यह सब आपके पतिव्रता होने का प्रभाव है। संसार की स्त्रियाँ आपके नाम के स्मरण मात्र से ही अखंड सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं तथा समस्त सिद्धियों का सृजन तथा विनाश कर सकती हैं। आपकी भावना तथा चमत्कारी शक्ति को देखकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं आशीर्वाद स्वरूप कहता हूँ कि जो स्त्रियाँ इस प्रकार गुप्त रूप से अपने पतियों का पूजन करके उनकी कुशलता की प्रार्थना करेंगी, उन्हें महादेवजी की कृपा से दीर्घायु पति का साथ प्राप्त होगा।

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