China Ethnic Unity Law क्या है? क्यों चीन के नए कानून का दुनियाभर में हो रहा विरोध, जानिए पूरा मामला
चीन ने 1 जुलाई को "जातीय एकता कानून" लागू किया। दुनिया भर में इसका विरोध हो रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह कानून चीन में रहने वाले अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। उनका तर्क है कि नया कानून अलग-अलग अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को चीनी समाज में पूरी तरह से घुलने-मिलने के लिए मजबूर करता है, जिससे वे अपनी भाषा, जीवनशैली और पारंपरिक पहनावे को बनाए रखने में असमर्थ हो जाते हैं। आइए इस मुद्दे को विस्तार से समझें: इस कानून में असल में क्या है? इसे क्यों ज़रूरी समझा गया? इस मामले पर चीन का क्या तर्क है?
चीन को इस कानून की ज़रूरत क्यों पड़ी?
चीन का आधिकारिक रुख यह है कि राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता और अलगाववाद व चरमपंथ को रोकने के लिए यह कानून ज़रूरी है। चीन का कहना है कि यह कानून भाषाई समानता और एक एकीकृत राष्ट्रीय पहचान को बढ़ावा देकर आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को हल करने में मदद करेगा। चीन लंबे समय से ऐसे कानून की ज़रूरत महसूस कर रहा था; इसे देश को एकजुट करने के लिए लाया गया था। हालाँकि, आलोचकों का तर्क है कि नया कानून भाषा, धर्म और जीवन के अन्य पहलुओं को नियंत्रित करने की एक कोशिश है। इसे "सिनिसाइज़ेशन" (चीनीकरण) की व्यापक नीति का कानूनी रूप बताया जा रहा है।
सिनिसाइज़ेशन क्या है?
आसान शब्दों में कहें तो, इसका मतलब है किसी व्यक्ति या समुदाय को चीनी सांस्कृतिक ढांचे में ढालने की प्रक्रिया। सिनिसाइज़ेशन तब होता है जब कोई सरकार या समाज अलग-अलग समुदायों - जैसे मुस्लिम, बौद्ध या अन्य अल्पसंख्यक - से यह उम्मीद करता है कि वे देश की मुख्यधारा की संस्कृति, भाषा और रीति-रिवाजों को पूरी तरह से अपनाने के लिए अपनी अलग पहचान, भाषा और अनोखी संस्कृति को छोड़ दें। इस अवधारणा को निम्नलिखित उदाहरणों से समझा जा सकता है:
भाषा में बदलाव: किसी ऐसे अल्पसंख्यक समुदाय को, जिसकी अपनी अलग भाषा है, केवल मंदारिन बोलने और उसी भाषा में शिक्षा लेने के लिए मजबूर करना।
पहचान और पहनावा: लोगों से यह उम्मीद करना कि वे अपने पारंपरिक पहनावे को छोड़ दें और चीन के बहुसंख्यक हान समुदाय के पहनावे और व्यवहार के तरीकों को अपनाएँ। धर्म परिवर्तन: धार्मिक प्रथाओं को सरकारी विचारधारा के अनुरूप बदलना - जैसे मस्जिदों या मठों की वास्तुकला को चीनी शैली में बदलना, या धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या राज्य के सिद्धांतों के अनुसार करना।
खान-पान और रीति-रिवाज: स्थानीय त्योहारों के बजाय राष्ट्रीय त्योहारों को प्राथमिकता देना।
आलोचकों की चिंताएँ: मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इन उपायों के ज़रिए, चीन देश में एक ही विचारधारा और संस्कृति का वर्चस्व सुनिश्चित करने के लिए अल्पसंख्यक समुदायों की पुश्तैनी पहचान को खत्म कर रहा है।
यह कानून कब लाया गया था? यह बिल नेशनल पीपल्स कांग्रेस से होकर आगे बढ़ा। पूरी प्रक्रिया 2025-26 के दौरान चली। आखिरकार, 12 मार्च 2026 को यह कानून पास हुआ और उसी दिन राष्ट्रपति ने इस पर हस्ताक्षर किए। यह 1 जुलाई को चीन में लागू हुआ। इसे लागू करने का मतलब यह नहीं है कि सभी इलाकों में इसे एक ही तरीके से माना जाएगा; स्थानीय प्रशासन और विभाग इसे अपने-अपने स्तर पर लागू करेंगे। आलोचकों का यह भी कहना है कि कानून के प्रावधान और उनकी व्याख्याएं बहुत व्यापक और अस्पष्ट हैं, जिसका मतलब है कि इन पाबंदियों का असल असर और दायरा समय के साथ ही साफ हो पाएगा।
नए कानून की प्रकृति क्या है?
यह कानून चीन की राष्ट्रीय एकता पर ज़ोर देता है और अलगाववाद, चरमपंथ और धार्मिक कट्टरपंथ को रोकने का लक्ष्य रखता है। इसके कई प्रावधान सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से जुड़े हैं। इस नए कानून के लागू होने से सरकारी तंत्र को व्यापक अधिकार मिल सकते हैं। अधिकारियों को शिक्षा और पाठ्यक्रम में बदलाव करने का अधिकार मिल सकता है। धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर शर्तें लगाई जा सकती हैं, और कानून में निगरानी और पहचान की पुष्टि के उपाय भी शामिल किए जा सकते हैं।

