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ट्रंप के 50 बैरल तेल मांगने पर वेनेजुएला की नई राष्ट्रपति का तीखा जवाब, कहा– अमेरिकी हमलों की कीमत हम पहले ही चुका चुके हैं

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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वेनेजुएला के बीच एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। ताजा विवाद उस वक्त सामने आया, जब ट्रंप की ओर से कथित तौर पर वेनेजुएला से 50 बैरल तेल की जबरन मांग किए जाने की बात सामने आई। इस पर वेनेजुएला की नई राष्ट्रपति ने कड़ा और सीधा जवाब देते हुए अमेरिका की नीतियों और उसके सैन्य हस्तक्षेपों पर सवाल खड़े कर दिए।

नई राष्ट्रपति ने अपने बयान में कहा कि वेनेजुएला पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों, आर्थिक दबाव और हमलों की भारी कीमत चुका चुका है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश के प्राकृतिक संसाधन किसी दबाव या धमकी के तहत नहीं दिए जाएंगे। राष्ट्रपति ने यह भी जोड़ा कि वेनेजुएला एक संप्रभु राष्ट्र है और अपने तेल संसाधनों पर फैसला लेने का पूरा अधिकार रखता है।

अपने बयान में राष्ट्रपति ने कहा, “अमेरिकी हमलों और प्रतिबंधों के कारण हमारे देश की अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था और आम जनता को वर्षों तक नुकसान झेलना पड़ा है। अब किसी भी तरह की जबरन मांग या दबाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि तेल वेनेजुएला की जनता की संपत्ति है और इसका इस्तेमाल देश के विकास और नागरिकों के कल्याण के लिए किया जाएगा।

जानकारों के मुताबिक, ट्रंप के कार्यकाल के दौरान वेनेजुएला पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में भारी तनाव आ गया था। तेल संपदा से भरपूर होने के बावजूद वेनेजुएला को इन प्रतिबंधों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। ऐसे में तेल को लेकर किसी भी तरह की मांग को वेनेजुएला की जनता संवेदनशील मुद्दा मानती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नई राष्ट्रपति का यह बयान न सिर्फ अमेरिका को सीधा संदेश है, बल्कि यह घरेलू राजनीति के लिहाज से भी अहम है। इससे यह साफ संकेत जाता है कि नई सरकार राष्ट्रीय सम्मान और संप्रभुता के मुद्दे पर किसी तरह का समझौता नहीं करेगी। साथ ही, यह बयान लैटिन अमेरिकी देशों में अमेरिका के प्रभाव को लेकर चल रही बहस को भी और तेज कर सकता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस बयान के बाद प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कुछ देशों ने वेनेजुएला के रुख को समर्थन देते हुए कहा है कि किसी भी राष्ट्र के संसाधनों पर दबाव बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक मर्यादाओं के खिलाफ है। वहीं, अमेरिका समर्थक विश्लेषक इसे राजनीतिक बयानबाजी करार दे रहे हैं।

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