ईरान की जवाबी कार्रवाई से घबराया अमेरिका: ब्रिटेन से 12 बॉम्बर एयरक्राफ्ट वापस बुलाए, होटलों में शरण लेने को मजबूर जवान
ईरान पर सैन्य दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने अपनी ताकत दिखाई, लेकिन अब यही संघर्ष उसके लिए नई मुश्किलें खड़ी करता नजर आ रहा है। ईरानी ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद अमेरिका को मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य तैनाती और रणनीति में बदलाव करना पड़ा है।इसी कड़ी में ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस से अमेरिका के 12 B-1 बमवर्षक विमानों को अचानक वापस अमेरिका भेज दिया गया। अमेरिका ने इसे सुरक्षा से जुड़ा सामान्य फैसला बताया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इस कदम को ज्यादा महत्व नहीं दिया।हालांकि, पिछले कुछ महीनों की घटनाओं से संकेत मिलता है कि ईरानी हमलों ने अमेरिकी सेना को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है।
ब्रिटेन से 12 B-1 बमवर्षक क्यों हटाए गए?
RAF फेयरफोर्ड एयरबेस पर अमेरिका के 12 B-1 बमवर्षक विमान तैनात थे। ये लंबी दूरी तक उड़ान भरकर हमला करने में सक्षम हैं।रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी कमांडरों को ऐसी जानकारी मिली थी कि ईरान समर्थित लोग एयरबेस की सुरक्षा दीवार के बाहर से ड्रोन हमले की तैयारी कर रहे हैं। इसके बाद इन विमानों को वापस अमेरिका भेजने का फैसला किया गया।फेयरफोर्ड एयरबेस अमेरिका और ब्रिटेन के सैन्य सहयोग का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1944 में बनाए गए इस एयरबेस का इस्तेमाल लंबे समय से अमेरिकी रणनीतिक बमवर्षक विमानों के लिए किया जाता रहा है।
मिडिल ईस्ट के कई ठिकानों से सैनिक हटे
ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले लगातार किए जाने के बाद अमेरिका ने बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात में अपनी सैन्य तैनाती को भी बदलना शुरू किया।इनमें से कई ठिकाने ईरान की मिसाइल और ड्रोन की पहुंच में हैं। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान हुआ। पोर्ट शुएबा पर हुए एक हमले में अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने की भी जानकारी सामने आई।बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े का मुख्यालय है, जबकि कतर का अल-उदीद एयरबेस मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सेंट्रल कमांड के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इन ठिकानों पर हमलों के बाद अमेरिका को अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर दोबारा विचार करना पड़ा है।
सैनिकों को होटल और दफ्तरों में रहना पड़ा
ईरानी हमलों का असर इतना बढ़ा कि कुछ अमेरिकी सैनिकों को अपने सैन्य ठिकानों से हटकर होटल और दूसरे सुरक्षित स्थानों पर रहना पड़ा।इसके बाद एक और समस्या सामने आई। ईरान समर्थित समूहों ने अमेरिकी सैनिकों की नई लोकेशन का पता लगाने की कोशिश शुरू कर दी। कुछ सैनिक ऐसे होटलों में भी रह रहे थे, जहां सैन्य ठिकानों जैसी सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब में CIA से जुड़े एक ठिकाने को भी नुकसान पहुंचा। मिडिल ईस्ट में अमेरिका के कई प्रमुख सैन्य ठिकाने हमलों के बाद पूरी क्षमता से इस्तेमाल करने की स्थिति में नहीं रहे।अब पेंटागन के सामने सवाल है कि इन ठिकानों को दोबारा बनाया जाए या अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को ईरान से और दूर ले जाया जाए।
ड्रोन ने बदली अमेरिका की पुरानी रणनीति
इस संघर्ष ने अमेरिकी सेना के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। पहले माना जाता था कि अगर सैनिकों और विमानों को दुश्मन की मिसाइलों की सीधी पहुंच से दूर रखा जाए तो वे काफी हद तक सुरक्षित रहेंगे।लेकिन ड्रोन ने इस रणनीति को मुश्किल बना दिया है।ड्रोन छोटे होते हैं, उन्हें छिपाना आसान होता है और इन्हें लंबी दूरी तक पहुंचाकर अचानक हमला किया जा सकता है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यूक्रेन की ओर से रूस के खिलाफ अपनाई गई ड्रोन रणनीति ने भी इस खतरे को उजागर किया है।अब अमेरिका को डर है कि इसी तरह की रणनीति का इस्तेमाल उसके सैन्य ठिकानों के खिलाफ भी किया जा सकता है।
ईरान को भारी नुकसान, फिर भी अमेरिका की मुश्किल बढ़ी
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का दावा है कि शुरुआती सैन्य कार्रवाई में ईरान की नौसेना और वायुसेना को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन इसके बावजूद ईरान अमेरिकी सैन्य ठिकानों को लगातार निशाना बनाने में सक्षम रहा है।यही इस संघर्ष का सबसे बड़ा विरोधाभास बन गया है।ईरान को सैन्य नुकसान उठाना पड़ा है, लेकिन उसके ड्रोन और मिसाइल हमलों ने अमेरिकी सेना को ईरान के करीब मौजूद कुछ ठिकानों से दूरी बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है।अमेरिका लंबे समय से मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी को महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों की सुरक्षा से जोड़ता रहा है। लेकिन संघर्ष बढ़ने के बाद होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर के कुछ हिस्सों में जहाजों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती बन गई है।
अमेरिका नए सैन्य ठिकानों पर कर रहा विचार
पेंटागन अब इजराइल और जॉर्डन जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाकों में नए सैन्य ठिकाने बनाने के विकल्प पर विचार कर रहा है। हालांकि, नए बेस बनाना आसान नहीं होगा।इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस से फंडिंग की जरूरत होगी और निर्माण व सैन्य तैयारियों में कई साल लग सकते हैं। तब तक अमेरिका को अपने मौजूदा सैनिकों और हथियारों को दूसरे सुरक्षित ठिकानों पर रखना होगा।इसी वजह से अमेरिका के भीतर भी बड़े नए सैन्य बेस की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी मिडिल ईस्ट में क्षतिग्रस्त ठिकानों के बजाय अमेरिका के भीतर नए बड़े बेस की जरूरत का संकेत दिया है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या अमेरिका का मिडिल ईस्ट दबदबा कमजोर हो रहा है?
ईरान के साथ संघर्ष ने अमेरिका के सामने तीन बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
पहली, ईरान ड्रोन और मिसाइलों के जरिए दूर बैठे अमेरिकी सैनिकों को भी निशाना बनाने की क्षमता रखता है।
दूसरी, मिडिल ईस्ट में अमेरिका के कई पुराने सैन्य ठिकाने अब पहले जितने सुरक्षित नहीं रहे।
तीसरी, अगर अमेरिकी सेना को ईरान से और दूर तैनात किया जाता है तो किसी भी सैन्य कार्रवाई में ज्यादा समय, ईंधन और पैसा खर्च होगा।
इसका असर सिर्फ सैन्य स्तर पर नहीं बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी पड़ सकता है। अगर अमेरिका जैसी सैन्य शक्ति को अपने ठिकानों की सुरक्षा के लिए बार-बार तैनाती बदलनी पड़ती है, तो दूसरे देशों को भी यह संदेश मिल सकता है कि सीधे अमेरिकी सेना से भिड़ने के बजाय उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर दबाव बनाया जा सकता है।यानी जिस युद्ध के जरिए अमेरिका ईरान पर अपना दबदबा कायम करना चाहता था, वही संघर्ष अब अमेरिका को अपनी सैन्य रणनीति और मिडिल ईस्ट में मौजूदगी पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर रहा है।

