ग्रीनलैंड पर ट्रम्प की धमकियों के बीच यूरोप की सैन्य एकजुटता पर उठे सवाल, फुटेज में जानें सीमित तैनाती बनी मजाक का विषय
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर दी गई धमकियों के बीच यूरोप की तथाकथित ‘सैन्य एकजुटता’ अब सवालों के घेरे में आ गई है। ग्रीनलैंड की सुरक्षा के नाम पर यूरोपीय देशों की ओर से की गई सीमित सैन्य तैनाती को लेकर राजनीतिक और सैन्य हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। स्थिति यह है कि ब्रिटेन ने सुरक्षा सहयोग के तहत महज एक सैनिक भेजा है, जबकि सात अन्य यूरोपीय देशों के करीब 40 सैनिक ग्रीनलैंड की राजधानी नुउक पहुंचे हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक डेनमार्क, नॉर्वे, फिनलैंड, स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड्स और ब्रिटेन जैसे नाटो (NATO) सदस्य देशों ने मिलकर ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ नाम से एक संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया है। नुउक पहुंचे ये सैनिक इसी संयुक्त सैन्य ऑपरेशन का हिस्सा हैं। हालांकि, सैनिकों की बेहद सीमित संख्या ने इस अभियान की गंभीरता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रीनलैंड रणनीतिक रूप से बेहद अहम क्षेत्र माना जाता है। आर्कटिक क्षेत्र में इसकी भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधन और सैन्य महत्व के कारण यह लंबे समय से वैश्विक शक्तियों की नजर में रहा है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों के बाद यूरोपीय देशों से एक मजबूत और ठोस प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन मौजूदा तैनाती को देखकर आलोचकों का कहना है कि यह कदम प्रतीकात्मक ज्यादा और व्यावहारिक कम नजर आता है।
इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेत्तो ने इस पूरे सैन्य अभ्यास पर सवाल उठाते हुए इसे “एक मजाक” करार दिया है। उन्होंने इशारों में कहा कि यदि यूरोप वास्तव में अपनी सामूहिक सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर गंभीर है, तो उसे केवल नाममात्र की सैन्य मौजूदगी के बजाय ठोस और प्रभावी कदम उठाने चाहिए। क्रोसेत्तो की इस टिप्पणी के बाद यूरोप की रक्षा नीति और नाटो की एकजुटता पर नई बहस छिड़ गई है।
वहीं दूसरी ओर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने आलोचनाओं के बीच इस तैनाती का बचाव किया है। मैक्रों ने कहा कि आने वाले दिनों में इस सैन्य मिशन को जमीन, हवा और समुद्र के जरिए और मजबूत किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल तैनात सैनिकों की संख्या भले ही कम हो, लेकिन इसका उद्देश्य सैन्य ताकत दिखाना नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश देना है। मैक्रों के मुताबिक, यह संदेश साफ है कि नाटो देश एकजुट हैं और आर्कटिक क्षेत्र में अपनी सामूहिक जिम्मेदारी को लेकर सजग हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा अभियान यूरोप और नाटो के भीतर मौजूद मतभेदों को भी उजागर करता है। जहां कुछ देश इसे जरूरी राजनीतिक संकेत मान रहे हैं, वहीं अन्य इसे कमजोर और अपर्याप्त प्रतिक्रिया बता रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या नाटो वास्तव में ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर अपनी रणनीति को मजबूत करता है या यह अभियान केवल प्रतीकात्मक पहल बनकर रह जाता है।

