अमेरिका-ईरान की पीस डील के बीच चौधरी बन रहे पाकिस्तान अमेरिकी एक्सपर्ट ने दिखाया आइना, कहा- 'भरोसे के लायक नहीं....'
अमेरिका के एक जाने-माने एक्सपर्ट, माइकल रुबिन ने कहा है कि ईरान के मुद्दे को सुलझाने के लिए पाकिस्तान पर भरोसा करना वैसा ही है, जैसे दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी की समस्या को सुलझाने के लिए फासीवादी इटली पर भरोसा करना।
माइकल रुबिन 'मिडिल ईस्ट फ़ोरम' में पॉलिसी एनालिसिस के डायरेक्टर हैं। वह ईरान से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए पाकिस्तान को मध्यस्थ (mediator) के तौर पर इस्तेमाल करने की अमेरिकी नीति के कड़े आलोचक रहे हैं। रुबिन का तर्क है कि किसी भी देश को ऐसा मध्यस्थ नहीं चुनना चाहिए जो उसके अपने हितों को ही खत्म करना चाहता हो। मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान को शामिल करने का मतलब है कि अमेरिका बार-बार वही गलती दोहरा रहा है। रुबिन का मानना है कि पाकिस्तान लगातार अमेरिकी हितों के खिलाफ काम करता है। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के नज़रिए पर भी सवाल उठाए और कहा कि ट्रंप न सिर्फ़ ईरान की बातचीत करने की क्षमता से प्रभावित हैं, बल्कि कतर और खासकर पाकिस्तान जैसे मध्यस्थों को चुनने से भी प्रभावित हैं।
पाकिस्तान पर भरोसा क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
पाकिस्तान के पिछले व्यवहार का ज़िक्र करते हुए रुबिन ने कहा कि इस देश ने कई बार अमेरिका को धोखा दिया है। उन्होंने तालिबान में पाकिस्तान की भूमिका, ओसामा बिन लादेन को लंबे समय तक पनाह देने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को शुरू करने में पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक ए.क्यू. खान की मदद जैसे मुद्दों पर ज़ोर दिया। रुबिन के मुताबिक, मध्यस्थ के तौर पर काम करते हुए भी पाकिस्तान पर्दे के पीछे से तनाव बढ़ाने की कोशिश करेगा। वह आग बुझाने वाले और आग लगाने वाले, दोनों की भूमिका निभाकर दोनों पक्षों को फायदा पहुंचाने की कोशिश करेगा। इस नज़रिए से कोई भी स्थायी समझौता नहीं हो पाएगा और इलाके में अस्थिरता बनी रहेगी। रुबिन ने कहा, "पाकिस्तान ने बार-बार अमेरिका को धोखा दिया है। फिर भी, अमेरिका वही गलती दोहराता रहता है।"
अमेरिका-ईरान बातचीत
यह बयान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक कोशिशों के बीच आया है। शांति समझौते या मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (MoU) के लिए बातचीत चल रही है, जिस पर जिनेवा में औपचारिक रूप से हस्ताक्षर होने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने इस प्रक्रिया में पाकिस्तान और कतर को मध्यस्थ के तौर पर शामिल किया है। रुबिन का मानना है कि ट्रंप ईरान की बातचीत करने की क्षमता और मध्यस्थों के चयन से प्रभावित हुए हैं, जबकि पाकिस्तान जैसे देश पर भरोसा करना खतरनाक साबित हो सकता है।

