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हिमालय में फिर कुदरत का कहर! 7 मिनट में तबाही का खौफनाक मंजर, बेअसर साबित हुए चीन के सारे इंतजाम

हिमालय में फिर कुदरत का कहर! 7 मिनट में तबाही का खौफनाक मंजर, बेअसर साबित हुए चीन के सारे इंतजाम

26 अगस्त को चीन-नेपाल सीमा के पास हिमालय की एक घाटी में आई भीषण आपदा ने सबको झकझोर दिया। इस तबाही में 1,200 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की बात सामने आई। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जिस इलाके में यह घटना हुई, वहां चीन ने करीब एक साल पहले आई प्राकृतिक आपदा के बाद बाढ़ और भूस्खलन से निपटने के लिए बड़े स्तर पर तैयारियां की थीं।
करीब 14 महीने पहले इसी इलाके में एक ग्लेशियल झील के फटने के बाद अचानक बाढ़ और भूस्खलन आया था। पानी और मलबे की तेज धार में ट्रक, मकान और एक पुल तक बह गए थे। उस घटना के बाद चीन ने करीब छह महीने तक बॉर्डर पोर्ट को बंद रखा और इलाके में आपदा से बचाव के इंतजाम मजबूत किए।

पानी के स्तर पर 24 घंटे निगरानी के लिए सिस्टम लगाए गए। तटबंध और बाढ़ रोधी दीवारें बनाई गईं। पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए नहरों और दूसरे इंतजाम तैयार किए गए। अधिकारियों और स्थानीय लोगों को आपदा की स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग दी गई और मॉक ड्रिल भी कराई गई। जुलाई में तैयारियों की समीक्षा तक की गई।

यानी पिछली आपदा से सबक लेने और भविष्य के खतरे से निपटने के लिए काफी तैयारी की गई थी। लेकिन 26 अगस्त को प्रकृति ने खतरे का ऐसा रूप दिखाया, जिसके लिए मौजूद सिस्टम पूरी तरह तैयार नहीं था।

इस बार ग्लेशियल झील नहीं, सीधे ग्लेशियर टूटा
इस बार तबाही की शुरुआत किसी ग्लेशियल झील के फटने से नहीं हुई। एक ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर पहाड़ से नीचे आ गया। इसके साथ बर्फ, भारी चट्टानें और पानी भी तेजी से नीचे की तरफ बढ़ने लगे।

कुछ ही समय में बर्फ, पत्थरों और पानी का यह मिश्रण एक बेहद ताकतवर लहर में बदल गया। इसकी रफ्तार इतनी तेज थी कि रास्ते में आने वाली चीजों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।

यह लहर ग्यिरोंग पोर्ट कॉम्प्लेक्स तक पहुंची और वहां मौजूद 27 इमारतों को नुकसान पहुंचा दिया। इसके बाद तबाही का यह सिलसिला नेपाल की ओर बढ़ गया।

सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि ग्लेशियर का हिस्सा टूटने और मलबे के ग्यिरोंग पोर्ट तक पहुंचने के बीच सिर्फ छह से सात मिनट का समय बताया जा रहा है। इतने कम समय में किसी बड़े इलाके को अलर्ट करना, लोगों को निकालना और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना बेहद मुश्किल है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियर का वह हिस्सा अचानक क्यों टूटा, इसकी पूरी वजह अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि, बढ़ते तापमान, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और पहाड़ों की चट्टानों के कमजोर होने जैसी परिस्थितियां इसके पीछे संभावित कारण हो सकती हैं।

एक ही इलाके में बार-बार क्यों आ रही आपदा?
इस घटना ने सिर्फ चीन की आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि यह भी सवाल खड़ा किया कि आखिर ग्यिरोंग पोर्ट जैसी महत्वपूर्ण सीमा चौकी को इतनी जोखिम वाली जगह पर क्यों विकसित किया गया।

ग्यिरोंग पोर्ट एक संकरी हिमालयी घाटी में स्थित है। यहां ल्हेंडे खोला और त्रिशूली नदी का क्षेत्र है और आसपास के पहाड़ों से आने वाला पानी इस इलाके को प्रभावित करता है।

समस्या यह है कि इसी सीमित समतल क्षेत्र में पुल, कस्टम यार्ड, ड्राई पोर्ट और ट्रकों की पार्किंग जैसी महत्वपूर्ण सुविधाएं मौजूद हैं। यानी ऊपर पहाड़ों से अगर अचानक पानी, बर्फ या मलबा नीचे आता है, तो इस इलाके के प्रभावित होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।

डिजास्टर मैनेजमेंट विशेषज्ञों के मुताबिक, 2025 में भी इसी इलाके में लोग अचानक आई बाढ़ और मलबे की चपेट में आए थे। एक साल बाद फिर उसी क्षेत्र में बड़ी आपदा ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है कि क्या यहां सिर्फ बाढ़ से बचाव के इंतजाम पर्याप्त हैं?

खतरा है, फिर भी चीन के लिए ग्यिरोंग बेहद जरूरी
ग्यिरोंग पोर्ट प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील जरूर है, लेकिन चीन और नेपाल के बीच व्यापार के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण रास्ता बन चुका है।

पिछले करीब एक दशक में यह दोनों देशों के बीच प्रमुख व्यापारिक मार्गों में शामिल हो गया है। चीन और नेपाल के बीच होने वाले कुल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इसके अलावा हर साल बड़ी संख्या में लोग भी इसी बॉर्डर रूट का इस्तेमाल करते हैं।

इससे पहले चीन और नेपाल के बीच झांगमू-कोदारी बॉर्डर रूट काफी महत्वपूर्ण था। लेकिन 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद यह रास्ता बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसके बाद ग्यिरोंग पोर्ट का महत्व तेजी से बढ़ता गया।

लेकिन मुश्किल यह है कि झांगमू रूट भी प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। 2016 में इस क्षेत्र में ग्लेशियल झील से जुड़ी बाढ़ की घटना सामने आई थी।

यानी हिमालय में एक जोखिम वाले रास्ते से बचकर दूसरे रास्ते पर जाने से प्राकृतिक आपदा का खतरा खत्म नहीं होता। विशेषज्ञों ने इस स्थिति की तुलना 'व्हैक-ए-मोल' गेम से की है—एक जगह खतरा कम करने की कोशिश होती है तो दूसरी जगह कोई नया खतरा सामने आ जाता है।

अब सिर्फ बाढ़ की निगरानी काफी नहीं
26 अगस्त की घटना ने हिमालयी इलाकों में आपदा प्रबंधन को लेकर एक बड़ी चुनौती सामने रख दी है। अब सिर्फ पानी का स्तर, बाढ़ या ग्लेशियल झीलों की निगरानी करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

इस घटना में खतरा एक के बाद एक पैदा हुआ। पहले ग्लेशियर का हिस्सा टूटा, फिर बर्फ और चट्टानें नीचे की ओर आईं और इसके बाद पानी व मलबे की तेज धार ने तबाही मचा दी।

विशेषज्ञ ऐसी घटनाओं को 'कैस्केड ऑफ हैजर्ड्स' यानी एक के बाद एक जुड़ी हुई आपदाओं की कड़ी कहते हैं।

जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों और पहाड़ी क्षेत्रों में बदलाव हो रहे हैं। ऐसे में भविष्य में आपदाओं का स्वरूप और ज्यादा जटिल हो सकता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक खतरे से निपटने के लिए तैयार किया गया सिस्टम दूसरे प्रकार की अचानक आने वाली आपदा को समय रहते पकड़ पाए, यह जरूरी नहीं।

पिछली आपदा से सबक लिया, लेकिन अगली आपदा का तरीका बदल गया
इस पूरी घटना की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि चीन ने पिछली आपदा के बाद बाढ़ से निपटने के लिए सेंसर, निगरानी व्यवस्था, तटबंध, दीवारें, नहरें, ट्रेनिंग और मॉक ड्रिल जैसी तैयारियां की थीं।

लेकिन इस बार तबाही की शुरुआत ही एक अलग प्रक्रिया से हुई। ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक टूटा और कुछ ही मिनटों में बर्फ, चट्टान और पानी का विशाल मलबा नीचे आ गया।

यानी समस्या सिर्फ यह नहीं है कि आपदा प्रबंधन की तैयारी कम थी। असली चुनौती यह है कि हिमालय में खतरा अब एक ही रूप में नहीं आ रहा।

26 अगस्त की घटना ने यही सबक दिया है कि पहाड़ी इलाकों में सिर्फ एक संभावित आपदा के लिए तैयारी करना काफी नहीं। भविष्य की व्यवस्था को ऐसे बहु-स्तरीय और अचानक बदलने वाले खतरों को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा।

क्योंकि इस बार चीन ने पिछली आपदा से सबक लिया था, लेकिन अगली आपदा ने खतरे का तरीका ही बदल दिया।

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