अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा कर्ज, वीडियो में जाने निवेशक तलाश रहे नए ठिकाने; सोना और चीन में बढ़ा रुझान
अमेरिका की बढ़ती कर्ज की चिंता और आर्थिक नीतियों को लेकर दुनियाभर के कुछ बड़े निवेशक अब अपने निवेश की रणनीति पर दोबारा विचार कर रहे हैं। अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज हो चुका है। इसके साथ ही बढ़ती ब्याज दरें, नए टैरिफ और अलग-अलग देशों पर लगाए जा रहे आर्थिक प्रतिबंधों ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई है।हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि दुनिया अमेरिका से पूरी तरह दूरी बना रही है। अमेरिकी डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी बना हुआ है और अमेरिकी शेयर बाजार तथा बॉन्ड मार्केट में बड़ी मात्रा में वैश्विक पूंजी निवेशित है। लेकिन कुछ निवेशक अब अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाने के विकल्प तलाश रहे हैं।
अमेरिकी बॉन्ड बाजार में दिखी चिंता
अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्ड बाजार में निवेशकों की चिंता का असर दिखाई देने लगा है। 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड सितंबर में करीब 5 फीसदी के स्तर तक पहुंच गई।रिपोर्ट के मुताबिक, 11 सितंबर को 10 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 4.93 फीसदी थी, जबकि इससे पहले यह 4.979 फीसदी तक पहुंच चुकी थी। आम भाषा में समझें तो बॉन्ड यील्ड बढ़ने का मतलब है कि सरकार को नया कर्ज लेने के लिए निवेशकों को ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है।इसका सीधा असर सरकार की उधारी लागत पर पड़ता है। लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची रहने से सरकारी खर्च और बजट पर दबाव बढ़ सकता है।
कुछ देश घटा रहे अमेरिकी बॉन्ड में निवेश
अमेरिकी कर्ज बढ़ने और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच कुछ बड़े सरकारी फंडों ने अमेरिकी बॉन्ड में निवेश कम करना शुरू किया है। वहीं, कई देशों के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।सोने को आर्थिक अनिश्चितता के समय एक सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है। इसी वजह से कई केंद्रीय बैंक पिछले कुछ समय से सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं।
जर्मन कंपनियों का चीन की ओर बढ़ा निवेश
निवेश के रुझान में बदलाव का एक उदाहरण जर्मनी की कंपनियों में भी देखने को मिला है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में जर्मन कंपनियों ने अमेरिका में निवेश घटाया, जबकि चीन में निवेश बढ़ाया।विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे व्यापारिक नीतियां, टैरिफ और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े फैसले जैसे कारण हो सकते हैं।
डॉलर की पकड़ अभी भी मजबूत
हालांकि, अमेरिका की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंताओं के बावजूद डॉलर की वैश्विक स्थिति अभी मजबूत बनी हुई है। दुनिया के कई देशों के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा अब भी डॉलर में रखा जाता है।अमेरिकी शेयर बाजार और बॉन्ड बाजार भी दुनिया के सबसे बड़े और सबसे ज्यादा तरल बाजारों में शामिल हैं। इसलिए ज्यादातर बड़े निवेशक पूरी तरह अमेरिका से बाहर नहीं जा रहे हैं, बल्कि अपने निवेश को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटने की कोशिश कर रहे हैं।
आगे क्या असर पड़ सकता है?
अगर अमेरिका का कर्ज और ब्याज भुगतान लगातार बढ़ता है तो इसका असर उसकी आर्थिक नीतियों और सरकारी खर्च पर पड़ सकता है। वहीं, वैश्विक निवेशकों का रुख आने वाले समय में ब्याज दरों, डॉलर की स्थिति और अमेरिका की आर्थिक नीतियों पर निर्भर करेगा।फिलहाल स्थिति यह है कि अमेरिका अब भी वैश्विक वित्त व्यवस्था का केंद्र बना हुआ है, लेकिन बढ़ते कर्ज और आर्थिक दबावों के कारण निवेशक नए विकल्पों पर भी नजर रख रहे हैं।

