Israel Election: नेतन्याहू को चुनौती दे रहे पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट, चुनाव में 4 बड़े मुद्दों पर नजर
इजराइल में संसदीय चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट से कड़ी चुनौती मिलने की चर्चा है। चुनाव से पहले सामने आए छह ओपिनियन पोल में से चार में आइजनकोट के गठबंधन को ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। वहीं, एक सर्वे में नेतन्याहू के गठबंधन को बढ़त मिली है, जबकि एक अन्य पोल में उसे बहुमत मिलने की संभावना जताई गई है।
इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। किसी भी गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। देश की चुनावी व्यवस्था के तहत किसी एक पार्टी के लिए अकेले बहुमत हासिल करना मुश्किल रहा है। इजराइल के राजनीतिक इतिहास में अब तक कोई भी पार्टी अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाई है।
इजराइल में कैसे होता है चुनाव?
इजराइल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक पार्टियों को वोट देते हैं। चुनाव से पहले प्रत्येक पार्टी अपने उम्मीदवारों की सूची जारी करती है। पूरे देश में पार्टी को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर संसद में उसकी सीटें तय होती हैं।
हालांकि, संसद में सीट हासिल करने के लिए पार्टी को कुल वैध वोटों में से कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट प्राप्त करना जरूरी है। इस सीमा से कम वोट मिलने पर पार्टी को कोई सीट नहीं मिलती।
पार्टी को जितनी सीटें मिलती हैं, उसकी उम्मीदवार सूची में उतने ही शुरुआती उम्मीदवार सांसद बनते हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी पार्टी को 20 सीटें मिलने पर उसकी सूची में पहले 20 स्थानों पर मौजूद उम्मीदवार संसद पहुंचते हैं।
चुनाव के चार बड़े मुद्दे
1. हमास के 7 अक्टूबर के हमले की जवाबदेही
7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजराइल पर बड़ा हमला किया था। इस हमले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया एजेंसियों की विफलता को लेकर सरकार पर सवाल उठे थे।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार हमले को रोकने में नाकाम रही और उसे इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हमले की जांच और जवाबदेही का मुद्दा चुनाव में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2. हरेदी समुदाय को सेना में भर्ती से छूट
इजराइल में ज्यादातर यहूदी नागरिकों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है, लेकिन हरेदी समुदाय के कुछ लोगों को लंबे समय से विशेष छूट मिलती रही है। इसकी शुरुआत धार्मिक अध्ययन करने वाले सीमित संख्या में विद्यार्थियों को छूट देने से हुई थी। समय के साथ यह व्यवस्था राजनीतिक विवाद का विषय बन गई।
आलोचकों का कहना है कि जब देश युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब सैन्य सेवा की जिम्मेदारी सभी समुदायों के बीच समान रूप से बांटी जानी चाहिए।
नेतन्याहू के गठबंधन को हरेदी दलों का समर्थन मिलता रहा है। वहीं, गादी आइजनकोट का रुख इस मुद्दे पर अलग बताया जाता है। वह हरेदी समुदाय के लोगों को भी सैन्य या नागरिक सेवा में शामिल करने के पक्षधर हैं।
3. राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्ध
इजराइल की सुरक्षा नीति और युद्ध से जुड़े फैसले भी चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं। मतदाताओं के सामने यह सवाल है कि देश की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने, सेना की रणनीति तय करने और भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए कौन-सा नेतृत्व बेहतर नीतियां पेश करता है।
पूर्व सेना प्रमुख होने के कारण आइजनकोट का सैन्य अनुभव भी चुनावी चर्चा का हिस्सा है।
4. सरकार की जवाबदेही और नेतृत्व
नेतन्याहू के नेतृत्व और सुरक्षा मामलों में सरकार की भूमिका को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। वहीं, नेतन्याहू के समर्थक उनके राजनीतिक अनुभव और सुरक्षा नीति पर जोर देते हैं। ऐसे में चुनाव का परिणाम सरकार के कामकाज और नेतृत्व को लेकर मतदाताओं के रुख का संकेत दे सकता है।
कौन हैं गादी आइजनकोट?
गादी आइजनकोट ने 1978 में गोलानी ब्रिगेड में एक सैनिक के तौर पर अपना सैन्य करियर शुरू किया था। करीब 38 साल की सेवा के बाद वह 2015 में इजराइल के सेना प्रमुख बने और 2019 तक इस पद पर रहे।
सेना प्रमुख के रूप में उन्होंने सैन्य रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अहम फैसलों में भूमिका निभाई। उनके नाम से जुड़ी सैन्य रणनीति को ‘आइजनकोट डॉक्ट्रिन’ कहा जाता है।
गाजा युद्ध के दौरान दिसंबर 2023 में उनके बेटे गाल की मौत हो गई थी। इसके अगले दिन उनके भतीजे माओर कोहेन आइजनकोट भी दक्षिणी गाजा में लड़ाई के दौरान मारे गए। इन घटनाओं ने उनके परिवार को गहरा व्यक्तिगत नुकसान पहुंचाया।
चुनाव पर टिकी दुनिया की नजर
इजराइल के इस चुनाव में नेतन्याहू के राजनीतिक अनुभव और आइजनकोट की सैन्य पृष्ठभूमि के बीच मुकाबला चर्चा में है। हमास के हमले की जांच, सेना में भर्ती की नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकार की जवाबदेही जैसे मुद्दे मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, ओपिनियन पोल केवल संभावित रुझान बताते हैं। वास्तविक तस्वीर चुनाव परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट होगी। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को संसद की 120 सीटों में से कम से कम 61 सीटों का समर्थन जुटाना होगा।
नोट: आपके दिए गए लेख में चुनाव की तारीख, मतदान के समय और ओपिनियन पोल के आंकड़ों का स्वतंत्र सत्यापन नहीं किया गया है। प्रकाशन से पहले इन विवरणों की पुष्टि कर लें।

