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Israel Election 2026: 7 अक्टूबर के हमले ने बदली इजराइल की सियासत, नेतन्याहू के सामने बड़ी चुनौती
 

Israel Election 2026: 7 अक्टूबर के हमले ने बदली इजराइल की सियासत, नेतन्याहू के सामने बड़ी चुनौती

इजराइल में होने वाला आगामी आम चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का मुकाबला नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक बदलाव की परीक्षा भी है जो 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद देश में आया। हमले के बाद शुरू हुई गाजा जंग ने इजराइली राजनीति में सुरक्षा, सेना और हमास के खिलाफ कार्रवाई को सबसे बड़े चुनावी मुद्दों में शामिल कर दिया है।
तीन साल पहले तक महंगाई, मकानों की बढ़ती कीमतें और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे मुकदमे जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में थे। अब चुनावी चर्चा का फोकस मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और फिलिस्तीन नीति पर है।
नेतन्याहू के लिए सत्ता बचाना आसान नहीं
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के समय बेंजामिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री थे। इस हमले में करीब 1,200 लोगों की मौत हुई और 250 से अधिक लोगों को बंधक बनाया गया। इसके बाद इजराइल ने गाजा में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया।
अब चुनाव में नेतन्याहू को केवल विपक्ष से राजनीतिक चुनौती नहीं मिल रही, बल्कि हमले के दौरान हुई सुरक्षा चूक को लेकर भी उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार देश की सुरक्षा व्यवस्था को हमले से पहले पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं कर सकी।
पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट इस चुनाव में नेतन्याहू के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। कई सर्वेक्षणों में उनकी पार्टी को लिकुड के आसपास या उससे बेहतर स्थिति में दिखाया गया है।
दक्षिणपंथी राजनीति को मिला सुरक्षा मुद्दे का फायदा
इजराइल में दक्षिणपंथी राजनीति 7 अक्टूबर से पहले भी प्रभावशाली थी, लेकिन हमास के हमले के बाद सुरक्षा का मुद्दा और ज्यादा ताकतवर हो गया।
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के अलावा इतमार बेन-ग्विर और बेजेलेल स्मोट्रिच जैसे दक्षिणपंथी नेताओं ने हमास के खिलाफ सख्त कार्रवाई और फिलिस्तीनी राज्य के विरोध को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया है।
वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों, फिलिस्तीनी राज्य की संभावनाओं और हमास के भविष्य जैसे सवाल अब चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। इससे दक्षिणपंथी दलों को अपने पारंपरिक सुरक्षा एजेंडे को और मजबूती से सामने रखने का मौका मिला है।
लेफ्ट की राजनीति भी बदली
7 अक्टूबर के बाद इजराइल के वामपंथी दलों के लिए राजनीतिक जमीन पहले जैसी नहीं रही। पहले लेबर पार्टी और मेरेत्ज जैसे दल फिलिस्तीन के साथ राजनीतिक समाधान और शांति प्रक्रिया पर ज्यादा जोर देते थे।
बाद में दोनों राजनीतिक धाराओं को मिलाकर ‘द डेमोक्रेट्स’ पार्टी बनाई गई, जिसकी अगुआई पूर्व सैन्य अधिकारी याइर गोलान कर रहे हैं।
हालांकि पार्टी अब भी राजनीतिक समाधान और वेस्ट बैंक के विलय का विरोध करती है, लेकिन हमास के खिलाफ कार्रवाई और इजराइल की सुरक्षा को भी अपने राजनीतिक एजेंडे में प्रमुख स्थान देती है।
यही बदलाव बताता है कि सुरक्षा अब केवल दक्षिणपंथी दलों का मुद्दा नहीं रह गया है। नेतन्याहू का विरोध करने वाले दलों को भी मतदाताओं के सामने अपनी सुरक्षा नीति स्पष्ट करनी पड़ रही है।
अरब पार्टियों के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक मुश्किल
इजराइल की अरब पार्टियां कभी-कभी सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाती रही हैं। इसका बड़ा उदाहरण 2021 का चुनाव था, जब किसी भी राजनीतिक खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था।
उस समय नफ्ताली बेनेट और याइर लैपिड के नेतृत्व में बने गठबंधन में मंसूर अब्बास की अरब पार्टी राअम भी शामिल हुई थी। राअम की चार सीटों ने सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई और नेतन्याहू लंबे समय बाद सत्ता से बाहर हुए।
लेकिन 7 अक्टूबर के बाद राजनीतिक परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। अरब पार्टियों के पास पर्याप्त सीटें होने की स्थिति में भी उन्हें किसी बड़े गठबंधन में शामिल करना पहले की तुलना में ज्यादा संवेदनशील राजनीतिक फैसला माना जा रहा है।
बहुमत का आंकड़ा सबसे बड़ी कुंजी
इजराइल की संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। मौजूदा सर्वेक्षणों में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को इस आंकड़े से नीचे बताया जा रहा है।
ऐसे में चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं। नेतन्याहू के सामने चुनौती केवल अपनी लिकुड पार्टी को मजबूत करने की नहीं, बल्कि सहयोगी दलों के साथ मिलकर बहुमत जुटाने की भी है।
इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल यही है कि 7 अक्टूबर के बाद बदली इजराइली राजनीति आखिर किस दिशा में जाएगी। क्या मतदाता सुरक्षा के नाम पर मौजूदा दक्षिणपंथी धड़े को फिर मौका देंगे या हमले के लिए सरकार की जवाबदेही तय करने के नाम पर सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोलेंगे।
 

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