Israel Election 2026: नेतन्याहू की सत्ता पर संकट, चुनावी सर्वे में विपक्ष को बढ़त; छोटे दल तय करेंगे सरकार
इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। चुनाव से पहले सामने आए चार प्रमुख सर्वे में से दो में विपक्षी गठबंधन को बढ़त दिखाई गई है, जबकि एक सर्वे में दोनों खेमे बराबरी पर हैं और एक में नेतन्याहू का गठबंधन आगे है। हालांकि, किसी भी सर्वे में किसी एक खेमे को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है।
इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में चुनाव के बाद छोटे दलों और क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका अहम हो सकती है। सरकार किसकी बनेगी, यह काफी हद तक चुनावी नतीजों और गठबंधन की बातचीत पर निर्भर करेगा।
चुनाव से पहले इजराइल में बंटी जनता की राय
येरुशलम के महाने येहुदा बाजार में चुनावी पोस्टरों के बीच कुछ मतदाता नेतन्याहू को एक और मौका देने के पक्ष में हैं। 76 वर्षीय फल विक्रेता अब्राहम लेवी का मानना है कि प्रधानमंत्री को अपना काम पूरा करने का अवसर मिलना चाहिए।
वहीं, येरुशलम की जाफा स्ट्रीट पर कुछ लोग सरकार से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। दुकानदार इल्डा का कहना है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के लिए नेतन्याहू को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। तेल अवीव के जाफा इलाके में रहने वाले तुर्गेमान भी नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं और गादी आइजनकोट का समर्थन करने की बात कहते हैं।
इन अलग-अलग विचारों से स्पष्ट है कि इजराइल में चुनावी बहस केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। सुरक्षा, सरकार की जवाबदेही और भविष्य के नेतृत्व को लेकर मतदाताओं के बीच मतभेद हैं।
हमास के हमले और गाजा युद्ध का चुनाव पर असर
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में इजराइल में लगभग 1,200 लोग मारे गए थे। इसके बाद गाजा में इजराइली सैन्य कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी नागरिकों की मौत हुई। इस संघर्ष ने इजराइल की राजनीति और सुरक्षा नीति को गहराई से प्रभावित किया है।
आगामी चुनाव में नेतन्याहू के नेतृत्व, हमास के हमले को रोकने में सरकार की नाकामी के आरोप और देश की सुरक्षा जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण बने हुए हैं। मतदाताओं के सामने सवाल है कि मौजूदा नेतृत्व को जारी रखा जाए या सरकार में बदलाव किया जाए।
हमले में अपनों को खोने वाले परिवार भी एकमत नहीं
7 अक्टूबर के हमले में अपने परिजनों को खोने वाले परिवारों के बीच भी नेतन्याहू को लेकर अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं। किबुत्ज बेरी की मेराव के माता-पिता हमले में मारे गए थे। उनका मानना है कि जिस सरकार के कार्यकाल में इतनी बड़ी सुरक्षा चूक हुई, उसे दोबारा सत्ता में नहीं आना चाहिए।
दूसरी ओर, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से जुड़ी उम्मीदवार तालिक मजबूत नेतृत्व की जरूरत पर जोर देती हैं। इससे पता चलता है कि हमले से प्रभावित परिवारों के बीच भी सरकार की जवाबदेही और भविष्य के नेतृत्व को लेकर एक जैसी राय नहीं है।
फिलिस्तीन को अलग देश बनाने का मुद्दा कितना अहम?
चुनाव में फिलिस्तीन के भविष्य और दो राष्ट्र समाधान को लेकर भी बहस है, हालांकि यह मुद्दा प्रमुख यहूदी दलों के चुनावी विमर्श में अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देता है।
नेतन्याहू फिलिस्तीनी क्षेत्रों में इजराइल के सुरक्षा नियंत्रण को बनाए रखने के पक्षधर हैं। वहीं, विपक्ष के कई दल भी सुरक्षा के मामले में सख्त रुख अपनाते हैं। इसलिए नेतन्याहू का विरोध करने वाले सभी दल फिलिस्तीन के मुद्दे पर उनसे पूरी तरह अलग विचार नहीं रखते।
दिए गए सर्वे आंकड़ों के मुताबिक, विपक्षी मतदाताओं में 36 प्रतिशत और अरब नागरिकों में 57 प्रतिशत लोग दो राष्ट्र समाधान का समर्थन करते हैं। इस व्यवस्था के तहत इजराइल और फिलिस्तीन दो अलग-अलग देशों के रूप में अस्तित्व में रहेंगे।
छोटे दलों के हाथ में जा सकती है सत्ता की चाबी
इजराइल की संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। अगर किसी भी बड़े गठबंधन को यह आंकड़ा नहीं मिलता, तो उसे सरकार बनाने के लिए छोटे दलों का समर्थन हासिल करना होगा।
उपलब्ध अनुमानों में राम पार्टी को 5 सीटें, संयुक्त अरब सूची को 7 से 9 सीटें, ओफर विंटर की पार्टी को 5 सीटें और हेंडेल-जेलखा को 4 सीटें मिलने की संभावना बताई गई है। हालांकि, इन आंकड़ों के स्रोत और अलग-अलग सर्वे से इनके संबंध की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
चुनाव के बाद ये दल किस गठबंधन को समर्थन देते हैं, इससे सरकार गठन का पूरा समीकरण बदल सकता है। इसलिए विपक्ष को बढ़त मिलने के बावजूद नेतन्याहू की हार या विपक्ष की सरकार बनना अभी तय नहीं माना जा सकता।
भ्रष्टाचार मामले में भी नेतन्याहू की मुश्किलें
चुनाव से पहले नेतन्याहू को लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार के मुकदमे का भी सामना करना पड़ रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, वह रविवार, 11 अक्टूबर को सुनवाई के लिए अदालत में पेश हुए। इस दौरान इजराइल के पूर्व अटॉर्नी जनरल अविचाई मंडेलब्लिट ने गवाही दी।
मंडेलब्लिट ने 2019 में नेतन्याहू के खिलाफ मुकदमा चलाने का फैसला किया था। सुनवाई में उन्होंने तत्कालीन चीफ ऑफ स्टाफ के फोन टैप किए जाने से जुड़ी परिस्थितियों पर भी बयान दिया।
नेतन्याहू पर क्या हैं आरोप?
नेतन्याहू पर कारोबारियों से महंगे उपहार लेने और मीडिया संस्थानों को कथित लाभ पहुंचाने के बदले अपने पक्ष में खबरें प्रकाशित करवाने के आरोप हैं। उनके खिलाफ रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात से संबंधित मुकदमा चल रहा है।
नेतन्याहू इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं और मामले की सुनवाई अदालत में जारी है। ऐसे में चुनाव से पहले राजनीतिक विरोध, सुरक्षा से जुड़े सवाल और भ्रष्टाचार का मुकदमा उनके लिए बड़ी चुनौतियां बने हुए हैं।
कुल मिलाकर, इजराइल का आगामी चुनाव नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। हालांकि, सर्वे में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के संकेतों के बीच अंतिम तस्वीर चुनावी नतीजों और सरकार गठन के लिए होने वाले समझौतों के बाद ही साफ होगी।

