Samachar Nama
×

क्या टूटने की कगार पर है UK? स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड ने बढ़ाया दबाव

क्या टूटने की कगार पर है UK? स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड ने बढ़ाया दबाव

ब्रिटेन यानी यूनाइटेड किंगडम के एकजुट रहने को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के नेता सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में एक अहम बैठक करने वाले हैं। तीनों क्षेत्रों की मांग भले ही अलग-अलग हो, लेकिन एक बात पर उनकी सोच मिलती है—UK की मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत है और लोगों को अपने राजनीतिक भविष्य का फैसला खुद करने का अधिकार मिलना चाहिए।

माना जा रहा है कि बैठक के बाद तीनों क्षेत्रों के नेता एक साझा बयान जारी कर सकते हैं। इसमें जरूरत पड़ने पर जनमत संग्रह कराने के अधिकार की मांग भी शामिल हो सकती है। इसका मतलब यह है कि भविष्य में जनता को यह तय करने का मौका दिया जाए कि वह मौजूदा UK व्यवस्था के साथ रहना चाहती है या अपने क्षेत्र के राजनीतिक भविष्य के लिए कोई बड़ा फैसला लेना चाहती है।

स्कॉटलैंड में आजादी की मांग सबसे मजबूत

इस पूरे विवाद में स्कॉटलैंड सबसे महत्वपूर्ण है। यहां सत्ताधारी स्कॉटिश नेशनल पार्टी यानी SNP लंबे समय से स्कॉटलैंड को UK से अलग कर एक स्वतंत्र देश बनाने की मांग करती रही है।

स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी का कहना है कि मौजूदा समय में स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ऐसे नेता हैं जो UK की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। इससे ब्रिटेन को एकजुट रखने वाली व्यवस्था पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।

वेल्स भी मांग रहा ज्यादा अधिकार

वेल्स में राष्ट्रवादी पार्टी प्लाइड कम्री लंबे समय से वेल्स को ज्यादा अधिकार देने की मांग करती रही है। पार्टी के भीतर एक धड़ा वेल्स की पूर्ण स्वतंत्रता का भी समर्थन करता है।

हालांकि वेल्स में स्कॉटलैंड की तुलना में आजादी की मांग को उतना व्यापक समर्थन नहीं मिला है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वेल्श पहचान, अधिकारों और राजनीतिक स्वायत्तता का मुद्दा लगातार चर्चा में रहा है।

नॉर्दर्न आयरलैंड का मामला सबसे अलग

नॉर्दर्न आयरलैंड की स्थिति स्कॉटलैंड और वेल्स से कुछ अलग है। यहां सत्ताधारी सिन फेन लंबे समय से नॉर्दर्न आयरलैंड को UK से अलग कर आयरलैंड गणराज्य के साथ जोड़ने की मांग करती रही है।

सिन फेन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड भी कार्डिफ की बैठक में शामिल होने वाली हैं। पार्टी का जोर इस बात पर है कि नॉर्दर्न आयरलैंड के लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से यह तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि वे UK के साथ रहना चाहते हैं या आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहते हैं।

ब्रिटिश सरकार के सामने बढ़ी चुनौती

एक तरफ ब्रिटेन की केंद्र सरकार UK को एकजुट रखने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ज्यादा अधिकार और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव की मांग तेज हो रही है।

इस बीच ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम के एक बयान ने भी इस बहस को और हवा दी। उन्होंने कहा था कि अगर स्कॉटलैंड और नॉर्दर्न आयरलैंड में UK से अलग होने के पक्ष में पर्याप्त सहमति बनती है, तो जनमत संग्रह के सवाल पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि बाद में बर्नहम ने सफाई देते हुए कहा कि अगले आम चुनाव से पहले स्कॉटलैंड की आजादी को लेकर कोई जनमत संग्रह नहीं कराया जाएगा।

ट्रंप के बयान से आयरलैंड एकीकरण की चर्चा तेज

नॉर्दर्न आयरलैंड को लेकर बहस उस समय और तेज हो गई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में आयरलैंड के एकीकरण को लेकर बयान दिया।

डबलिन दौरे के दौरान ट्रंप ने कहा कि वह आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना पसंद करेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपतियों की ओर से इस संवेदनशील मुद्दे पर आमतौर पर सावधानी बरती जाती रही है, इसलिए ट्रंप का बयान चर्चा का विषय बन गया।

मामला सिर्फ आजादी का नहीं, EU भी बड़ा मुद्दा

UK के भीतर अलगाव की बहस सिर्फ राजनीतिक अधिकारों या स्वतंत्र देश बनने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे यूरोप के साथ रिश्ते भी एक बड़ा मुद्दा हैं।

स्कॉटलैंड और वेल्स की कई प्रमुख राजनीतिक पार्टियां यूरोपीय संघ यानी EU के साथ ज्यादा करीबी संबंध चाहती हैं। अगर भविष्य में स्कॉटलैंड या वेल्स स्वतंत्र देश बनते हैं, तो वे EU की सदस्यता के लिए आवेदन कर सकते हैं।

वहीं नॉर्दर्न आयरलैंड अगर भविष्य में आयरलैंड गणराज्य के साथ जुड़ता है, तो वह EU का हिस्सा बन जाएगा, क्योंकि आयरलैंड पहले से ही यूरोपीय संघ का सदस्य है।

गौर करने वाली बात है कि UK ने 2020 में औपचारिक रूप से EU छोड़ दिया था। इससे पहले 2016 में हुए जनमत संग्रह में ब्रिटेन के लोगों ने EU से बाहर निकलने के पक्ष में मतदान किया था। लेकिन स्कॉटलैंड में बहुमत ने EU में बने रहने का समर्थन किया था। Brexit के बाद इसी अंतर ने स्कॉटलैंड की आजादी की बहस को और मजबूती दी।

स्कॉटलैंड और इंग्लैंड कैसे बने एक देश?

करीब 300 साल पहले स्कॉटलैंड और इंग्लैंड दो अलग-अलग देश थे। दोनों की अपनी संसद, कानून और राजशाही थी।

1603 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम की मृत्यु के बाद स्कॉटलैंड के राजा जेम्स VI इंग्लैंड के भी राजा बने। हालांकि उस समय दोनों देश राजनीतिक रूप से अलग थे, लेकिन दोनों की राजशाही एक व्यक्ति के अधीन आ गई थी।

इसके करीब एक सदी बाद 1707 में स्कॉटलैंड और इंग्लैंड की संसदों ने एक समझौता किया। इसके बाद दोनों देशों का राजनीतिक एकीकरण हुआ और ग्रेट ब्रिटेन का गठन हुआ। दोनों की अलग-अलग संसदों की जगह एक साझा संसद बनी।

आजादी की मांग कब मजबूत हुई?

20वीं सदी में स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता की मांग को राजनीतिक ताकत मिलने लगी। 1934 में स्कॉटिश नेशनल पार्टी यानी SNP का गठन हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य स्कॉटलैंड को स्वतंत्र देश बनाना था।

1999 में स्कॉटलैंड को अपनी संसद और सरकार मिली। इसके बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और कई घरेलू मामलों में स्कॉटलैंड को खुद फैसले लेने की ताकत मिली, जबकि रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे UK सरकार के पास रहे।

इसके बाद 2014 में स्कॉटलैंड की आजादी पर जनमत संग्रह हुआ। इसमें करीब 55 प्रतिशत लोगों ने UK के साथ बने रहने के पक्ष में वोट दिया, जबकि करीब 45 प्रतिशत ने स्वतंत्रता का समर्थन किया। नतीजे के बाद स्कॉटलैंड UK का हिस्सा बना रहा।

लेकिन 2016 के Brexit जनमत संग्रह के बाद आजादी की मांग फिर तेज हो गई। इसकी वजह यह थी कि स्कॉटलैंड के अधिकांश मतदाताओं ने EU में बने रहने का समर्थन किया था, जबकि पूरे UK ने EU छोड़ने का फैसला किया।

वेल्स की अलग पहचान और आजादी की मांग

वेल्स का इतिहास भी इंग्लैंड से जुड़ा रहा है, लेकिन उसने अपनी भाषा, संस्कृति और अलग राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखा।

13वीं सदी में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड प्रथम ने वेल्स पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। बाद के समय में वेल्श भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए कई आंदोलन हुए।

1925 में प्लाइड कम्री पार्टी का गठन हुआ। शुरुआत में इसका जोर वेल्श भाषा और संस्कृति को बचाने पर था, लेकिन बाद में पार्टी ने वेल्स के लिए ज्यादा राजनीतिक अधिकार और स्वतंत्रता की मांग को भी अपने एजेंडे में शामिल किया।

1999 में वेल्स को भी अपनी संसद और सरकार मिली। हालांकि रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े फैसले अभी भी UK सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं।

नॉर्दर्न आयरलैंड का इतिहास और आयरलैंड से जुड़ने की मांग

नॉर्दर्न आयरलैंड का इतिहास सबसे ज्यादा जटिल है। 1801 में आयरलैंड भी ब्रिटेन के साथ राजनीतिक रूप से जुड़ गया था। हालांकि इस व्यवस्था का विरोध आयरलैंड के कई हिस्सों में लगातार होता रहा।

1922 में आयरलैंड का अधिकांश हिस्सा UK से अलग होकर स्वतंत्र देश बन गया। लेकिन आयरलैंड का उत्तरी हिस्सा यानी नॉर्दर्न आयरलैंड UK के साथ ही रहा।

इसके बाद वहां दो प्रमुख राजनीतिक सोच सामने आईं। एक पक्ष UK के साथ बने रहने का समर्थन करता था, जिसे यूनियनिस्ट कहा जाता है। वहीं दूसरा पक्ष आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहता था, जिसे आयरिश राष्ट्रवादी कहा जाता है।

इन दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक हिंसक संघर्ष भी चला। आखिरकार 1998 में गुड फ्राइडे समझौते के जरिए राजनीतिक समाधान की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया।

इस समझौते के तहत अगर भविष्य में यह स्पष्ट हो कि नॉर्दर्न आयरलैंड के ज्यादातर लोग UK से अलग होकर आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो वहां जनमत संग्रह कराया जा सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल क्या है?

अब कार्डिफ की बैठक के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड मिलकर ब्रिटेन की केंद्र सरकार पर संवैधानिक बदलाव के लिए दबाव बढ़ा पाएंगे?

तीनों क्षेत्रों की मांगें अलग-अलग हैं, लेकिन लोगों को अपने भविष्य का फैसला खुद करने का अधिकार देने की मांग उन्हें एक मंच पर ला रही है।

अगर यह राजनीतिक गठजोड़ मजबूत होता है, तो आने वाले समय में UK की एकता, स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता और नॉर्दर्न आयरलैंड के आयरलैंड से संभावित एकीकरण की बहस और ज्यादा तेज हो सकती है। अब नजर इस बात पर है कि कार्डिफ बैठक के बाद तीनों नेता क्या साझा घोषणा करते हैं और ब्रिटिश सरकार इसका क्या जवाब देती है।

Share this story

Tags