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Indus Water Projects: पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोकने की योजना को झटका, 4,963 मेगावॉट के 6 हाइड्रो प्रोजेक्ट अटके

Indus Water Projects: पाकिस्तान जाने वाले पानी को रोकने की योजना को झटका, 4,963 मेगावॉट के 6 हाइड्रो प्रोजेक्ट अटके

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की ओर जाने वाले नदियों के पानी का अधिक इस्तेमाल करने और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने से जुड़ी परियोजनाओं पर भारत में काम तेज करने की कोशिश की गई थी। हालांकि, अब इन योजनाओं की रफ्तार धीमी पड़ने की खबर है। प्रशासनिक मंजूरियों में देरी, पर्यावरण संबंधी प्रक्रियाओं, श्रमिक विवादों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण छह जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित बताई जा रही हैं।

इन परियोजनाओं की कुल प्रस्तावित क्षमता करीब 4,963 मेगावॉट बताई गई है। इनका उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन बढ़ाने और उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ परियोजनाएं निर्माण के अंतिम चरण के करीब पहुंचने के बावजूद विभिन्न अड़चनों के चलते समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं।

सावलकोट परियोजना पर टिकी निगाहें

जम्मू-कश्मीर में प्रस्तावित 1,856 मेगावॉट क्षमता वाली सावलकोट जलविद्युत परियोजना इन योजनाओं में अहम मानी जाती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, परियोजना से जुड़े वैश्विक कंसल्टेंसी टेंडर को रद्द कर दिया गया था और आगे की प्रक्रिया आवश्यक मंजूरियों के इंतजार में है।

इस परियोजना के पूरा होने से बिजली उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। हालांकि, मंजूरी और निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं में देरी के कारण इसकी समयसीमा प्रभावित होने की आशंका है।

सिंधु जल समझौते के बाद बढ़ा जल संसाधनों पर जोर

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला किया था। इसके बाद नदी जल के इस्तेमाल, भंडारण और जलविद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर चर्चा तेज हुई।

चिनाब और झेलम जैसी नदियों के जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत करना इस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, किसी भी परियोजना की वास्तविक क्षमता और प्रभाव उसके डिजाइन, मंजूरियों, निर्माण की स्थिति और लागू जल-संबंधी नियमों पर निर्भर करता है।

रावी नदी के पानी के इस्तेमाल की योजना

रावी नदी के पानी के बेहतर उपयोग के लिए पंजाब में शाहपुर कंडी बैराज और रणजीत सागर बांध जैसे बुनियादी ढांचे महत्वपूर्ण हैं। इनका उद्देश्य जल भंडारण, सिंचाई और बिजली उत्पादन सहित विभिन्न जरूरतों को पूरा करना है।

वहीं, जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बगलिहार और सलाल जैसी जलविद्युत परियोजनाएं बिजली उत्पादन और जल प्रवाह के प्रबंधन में भूमिका निभाती हैं। हालांकि, जल प्रवाह को नियंत्रित करने और पानी को पूरी तरह रोकने के बीच अंतर है। नदियों का पानी किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, यह परियोजनाओं की तकनीकी क्षमता और संबंधित नियमों पर निर्भर करता है।

छह परियोजनाओं की रफ्तार धीमी होने की क्या वजह है?

रिपोर्ट के अनुसार, परियोजनाओं के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं:

  • प्रशासनिक और अन्य जरूरी मंजूरियों में देरी।
  • पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियों की प्रक्रिया।
  • श्रमिकों और निर्माण कार्य से जुड़े विवाद।
  • प्राकृतिक आपदाओं के कारण निर्माण पर असर।
  • टेंडर और परियोजना प्रबंधन से जुड़ी समस्याएं।

इन अड़चनों को दूर करने के लिए संबंधित एजेंसियों के स्तर पर प्रक्रिया तेज करने की जरूरत बताई जा रही है।

समय पर काम पूरा करने की चुनौती

परियोजनाओं में देरी का असर निर्धारित समयसीमा और लागत पर पड़ सकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ परियोजनाओं को पूरा करने में नई मंजूरियां मिलने के बाद भी दो से तीन साल अतिरिक्त लग सकते हैं।

सरकार और संबंधित ऊर्जा एजेंसियों के सामने अब निर्माण कार्य को गति देने, लंबित मंजूरियां हासिल करने और परियोजनाओं की निगरानी मजबूत करने की चुनौती है। इन योजनाओं की प्रगति से भविष्य में बिजली उत्पादन और जल संसाधनों के इस्तेमाल की क्षमता पर असर पड़ सकता है।

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