पड़ोसी देश की चाल से भारत चिंतित? जानिए मक्का पैक्ट में बांग्लादेश-ईरान की एंट्री का सच
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच 7 अगस्त को हुआ 'मक्का समझौता' अब तीन देशों तक सीमित रहने वाला नहीं दिख रहा है। बांग्लादेश ने इस डिफेंस पैक्ट में शामिल होने की इच्छा खुलकर जाहिर की है। वहीं, मिस्र और ईरान को भी इस सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाने की कोशिशों की खबरें सामने आ रही हैं। बांग्लादेश की ओर से इसमें शामिल होने को लेकर सकारात्मक संकेत मिल चुके हैं, जबकि मिस्र ने कहा है कि वह इस संभावना पर विचार कर रहा है।
सबसे ज्यादा नजर ईरान पर है। हालांकि, तेहरान की ओर से इस मुद्दे पर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। ईरानी संसद के मीडिया अधिकारी ने दावा किया कि ईरान को इस समझौते में शामिल होने का न्योता मिला था। इसके बाद ईरान के विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि उसे ऐसा कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला है। इस विरोधाभास ने ईरान की संभावित भूमिका को लेकर सवाल और बढ़ा दिए हैं।
इजरायली अखबार 'द जेरूसलम पोस्ट' में इतालवी जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट जॉर्जिया वैलेंते ने लिखा है कि इस पूरे मामले में सदस्यों की संख्या बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर नए देश इस समझौते में शामिल होते हैं तो यह केवल तीन बड़ी मुस्लिम शक्तियों के बीच सुरक्षा व्यवस्था नहीं रहेगा, बल्कि इसका दायरा पूर्वी भूमध्यसागर से लेकर खाड़ी, हिंद महासागर और दक्षिण एशिया तक फैल सकता है।
मिस्र, ईरान और बांग्लादेश शामिल हुए तो क्या बदलेगा?
तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान लगातार यह कहते रहे हैं कि 'मक्का समझौता' एक रक्षात्मक सुरक्षा व्यवस्था है और इसका उद्देश्य किसी विशेष देश को निशाना बनाना नहीं है। हालांकि, समझौते से जुड़े नेताओं के बयानों से यह भी स्पष्ट है कि भविष्य में दूसरे देश इस ढांचे का हिस्सा बन सकते हैं।
समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने संकेत दिया था कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के इच्छुक देश इस व्यवस्था में शामिल हो सकते हैं। बाद में तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने भी मौजूदा तीन देशों को एक ऐसे ढांचे का आधार बताया, जिसका भविष्य में विस्तार संभव है।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर मोहम्मद अली जफर के मुताबिक, इस समझौते का महत्व सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं है कि यह आगे चलकर NATO जैसी सैन्य व्यवस्था बनेगा या नहीं। उनका मानना है कि मुस्लिम देशों के बीच साझा सुरक्षा व्यवस्था बनाने की सोच उन देशों में तेजी से आगे बढ़ रही है, जो अपनी सुरक्षा क्षमता मजबूत करना चाहते हैं और बाहरी हमले की स्थिति में मिलकर प्रतिक्रिया देने की क्षमता विकसित करना चाहते हैं।
भारत के लिए होर्मुज से हिंद महासागर तक बढ़ सकती है चुनौती
अगर भविष्य में ईरान और बांग्लादेश भी इस सुरक्षा ढांचे में शामिल होते हैं, तो इसका भारत की रणनीतिक और समुद्री सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि प्रस्तावित समूह की भौगोलिक पहुंच काफी बड़े क्षेत्र तक फैल जाएगी।
ईरान की संभावित भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा और समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। दूसरी तरफ, लाल सागर और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र पहले से ही संघर्ष और समुद्री सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावित रहा है। ऐसे में ईरान की किसी व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में औपचारिक भूमिका इस पूरे इलाके की रणनीतिक तस्वीर बदल सकती है।
भारत के लिए पश्चिमी समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। यूरोप और पश्चिमी देशों के साथ होने वाला व्यापार लाल सागर, बाब-अल-मंदेब और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से प्रभावित होता है। हालांकि, यह कहना कि इस समझौते में ईरान के शामिल होते ही भारत के यूरोपीय व्यापार का 80 फीसदी हिस्सा सीधे खतरे में आ जाएगा, फिलहाल एक संभावित परिदृश्य है, स्थापित तथ्य नहीं।
बांग्लादेश की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
बांग्लादेश के इस संभावित जुड़ाव को भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह भारत का अहम पड़ोसी है और बंगाल की खाड़ी के रणनीतिक क्षेत्र में स्थित है।
अगर बांग्लादेश भविष्य में किसी ऐसे बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनता है जिसकी नीतियां भारत के रणनीतिक हितों से टकराती हैं, तो इसका असर भारत की पूर्वी समुद्री सुरक्षा पर पड़ सकता है। बंगाल की खाड़ी, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और भारत के पूर्वी तट की सुरक्षा ऐसे परिदृश्य में और महत्वपूर्ण हो जाएगी।
हालांकि, बांग्लादेश के किसी संभावित सुरक्षा समझौते में शामिल होने को सीधे तौर पर 'भारत विरोधी कदम' मानना भी अभी जल्दबाजी होगी। किसी भी सैन्य या सुरक्षा गठबंधन की वास्तविक दिशा उसके आधिकारिक समझौते, सदस्य देशों की प्रतिबद्धताओं और भविष्य की रणनीति पर निर्भर करेगी।
क्या 'मक्का पैक्ट' NATO जैसा बन सकता है?
फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि 'मक्का समझौता' भविष्य में NATO जैसी सामूहिक रक्षा व्यवस्था का रूप लेगा। इसके लिए सदस्य देशों के बीच साझा सैन्य कमान, स्पष्ट रक्षा प्रतिबद्धताएं, संयुक्त सैन्य अभ्यास और किसी सदस्य पर हमले की स्थिति में सामूहिक कार्रवाई जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत होगी।
फिलहाल इसका सबसे बड़ा महत्व इस बात में है कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान जैसे प्रभावशाली मुस्लिम देश सुरक्षा सहयोग का एक नया ढांचा तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। अगर इसमें ईरान, मिस्र और बांग्लादेश जैसे देश भी शामिल होते हैं, तो इसका भौगोलिक और रणनीतिक महत्व कई गुना बढ़ सकता है।
भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती इस संभावित गठबंधन की वास्तविक प्रकृति और उसके भविष्य के विस्तार पर नजर रखना होगी। खासकर हिंद महासागर, अरब सागर, खाड़ी और बंगाल की खाड़ी में किसी भी नए सुरक्षा समीकरण का सीधा असर भारत की समुद्री रणनीति और व्यापारिक हितों पर पड़ सकता है।

