हिमालय में बढ़ता ‘वाटर बम’ का खतरा: क्या है GLOF, जो पलभर में मचा सकता है तबाही?
नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे भोटेकोशी नदी घाटी क्षेत्र में आई विनाशकारी आपदा ने एक बार फिर हिमालयी इलाकों में बढ़ते ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे को दुनिया के सामने ला दिया है। बर्फ, पानी, चट्टानों, मलबे और कीचड़ का तेज बहाव कुछ ही मिनटों में गांवों, कस्बों, सड़कों, पुलों और पनबिजली परियोजनाओं को तबाह कर सकता है।वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालय में तेजी से बदलता ग्लेशियर परिदृश्य और बढ़ता तापमान भविष्य में ऐसी घटनाओं का जोखिम बढ़ा सकता है। आखिर GLOF क्या है और यह इतना खतरनाक क्यों है?
कैसे बनती है ग्लेशियर झील?
ऊंचे पर्वतीय इलाकों में जब ग्लेशियर पिघलकर पीछे हटते हैं, तो उनके साथ मिट्टी, पत्थर और चट्टानी मलबा भी नीचे की ओर आता है। यह मलबा ग्लेशियर के निचले सिरे यानी स्नाउट के पास जमा होता रहता है।समय के साथ यही मलबा एक प्राकृतिक बांध जैसी संरचना बना देता है, जिसे मोरेन कहा जाता है। इसके पीछे ग्लेशियर से आने वाला पिघला हुआ पानी जमा होकर बड़ी झील का रूप ले सकता है।समस्या तब शुरू होती है जब यह प्राकृतिक बांध कमजोर होकर टूट जाता है। झील का भारी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह निकलता है। इसी घटना को GLOF कहा जाता है।
सिर्फ पानी नहीं, तबाही का पूरा पैकेज
GLOF को सामान्य बाढ़ से ज्यादा खतरनाक बनाने वाली बात इसका बहाव है। तेज पानी अपने साथ बड़े-बड़े पत्थर, चट्टानें, बर्फ, गाद और कीचड़ भी बहाकर लाता है।
इस वजह से इसका प्रवाह रास्ते में आने वाली सड़कों, पुलों, घरों और बिजली परियोजनाओं को बेहद कम समय में नुकसान पहुंचा सकता है। संकरी हिमालयी घाटियों में पानी और मलबे की रफ्तार इसे और विनाशकारी बना देती है।
किन वजहों से टूट सकती है मोरेन दीवार?
GLOF आमतौर पर किसी एक वजह से नहीं आता। इसके पीछे कई प्राकृतिक और मौसमी परिस्थितियां एक साथ काम कर सकती हैं।
झील में बढ़ता जलस्तर: लगातार पानी जमा होने से मोरेन पर दबाव बढ़ सकता है और उसमें रिसाव शुरू हो सकता है।
बर्फ या चट्टान का झील में गिरना: ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा या पहाड़ का मलबा झील में गिरने से अचानक बड़ी लहर पैदा हो सकती है।
भारी बारिश: बारिश जलस्तर बढ़ाने के साथ ढलानों पर मौजूद मलबे को अस्थिर कर सकती है।
भूकंप: हिमालय भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्र है। तेज झटके कमजोर मोरेन संरचना को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन क्यों बढ़ा रहा है चिंता?
हिमालय को दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में गिना जाता है। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और पीछे हटने की चिंता वैज्ञानिक लंबे समय से जता रहे हैं।ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई जगह नई झीलें बन रही हैं, जबकि मौजूदा ग्लेशियर झीलों का आकार भी बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि कुछ क्षेत्रों में भविष्य में संभावित GLOF का खतरा बढ़ सकता है।इसी वजह से हिमालयी ग्लेशियरों और झीलों की निगरानी अब आपदा प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है।
भारत के लिए भी बड़ा खतरा
GLOF का खतरा सिर्फ नेपाल या तिब्बत तक सीमित नहीं है। हिमालय से निकलने वाली नदियां भारत के बड़े हिस्से को प्रभावित करती हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी प्रणालियों से जुड़े क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों की निगरानी इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है।
उपग्रह तकनीक के जरिए ग्लेशियर झीलों के आकार और उनमें होने वाले बदलावों पर नजर रखी जा रही है। ऐसी निगरानी संभावित रूप से खतरनाक झीलों की पहचान करने और समय रहते चेतावनी देने में मदद कर सकती है।
विकास भी बढ़ा रहा है जोखिम
हिमालयी नदी घाटियों में पिछले कुछ दशकों में सड़क, सुरंग, पुल, बांध और पनबिजली परियोजनाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। समस्या यह है कि इनमें से कई निर्माण संकरी घाटियों में होते हैं, जहां अचानक आने वाली बाढ़ का असर बेहद गंभीर हो सकता है।
इसलिए विशेषज्ञों के लिए चुनौती सिर्फ GLOF को रोकना नहीं, बल्कि जोखिम वाले इलाकों में निर्माण और आबादी के विस्तार को वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित करना भी है।
पहले भी सामने आ चुकी हैं बड़ी त्रासदियां
हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और अचानक आने वाली बाढ़ पहले भी बड़े पैमाने पर तबाही मचा चुकी हैं।
चमोली, उत्तराखंड (2021): अचानक आई बाढ़ ने ऋषिगंगा और तपोवन क्षेत्र में भारी तबाही मचाई और पनबिजली परियोजनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा।
सिक्किम (2023): साउथ ल्होनाक झील के फटने से तीस्ता नदी घाटी में विनाशकारी बाढ़ आई और बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ।
हिमालयी फ्लैश फ्लड की घटनाएं: उत्तराखंड और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन लगातार चुनौती बने हुए हैं।
कैसे कम किया जा सकता है खतरा?
GLOF को पूरी तरह रोकना आसान नहीं है, लेकिन इसके नुकसान को कम करने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं।
अर्ली वार्निंग सिस्टम: संवेदनशील झीलों पर रियल-टाइम सेंसर, जलस्तर मॉनिटर और उपग्रह निगरानी बढ़ाई जाए।
जलस्तर कम करना: बेहद संवेदनशील झीलों से नियंत्रित तरीके से अतिरिक्त पानी निकालने की तकनीकों पर काम किया जाए।
जोखिम वाले क्षेत्रों की मैपिंग: संभावित बाढ़ के रास्तों की पहचान करके संवेदनशील गांवों और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा योजना तैयार की जाए।
सुरक्षित निर्माण: नदी घाटियों और ढलानों पर बड़े प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले विस्तृत वैज्ञानिक जोखिम आकलन जरूरी हो।
स्थानीय चेतावनी तंत्र: दूरदराज के पहाड़ी गांवों तक आपातकालीन अलर्ट पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत की जाए।
हिमालय की चेतावनी को समझना होगा
नेपाल-तिब्बत सीमा की ताजा आपदा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।बढ़ते तापमान, पीछे हटते ग्लेशियर और फैलती ग्लेशियर झीलों के बीच GLOF को भविष्य का संभावित ‘वाटर बम’ माना जा रहा है। ऐसे में समय रहते वैज्ञानिक निगरानी, मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली और संवेदनशील इलाकों में जिम्मेदार निर्माण ही जान-माल के नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकता है।

