Germany Election Shock: समलैंगिकता के खिलाफ नीतियां, फिर भी लेस्बियन नेता ने दिलाई जीत!
जर्मनी की राजनीति में अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी यानी AfD का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। सितंबर 2026 में सैक्सोनी-आनहाल्ट के चुनाव में पार्टी के शानदार प्रदर्शन ने पूरे देश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार है, जब जर्मनी में कोई दक्षिणपंथी पार्टी किसी राज्य में सत्ता के इतने करीब पहुंची है।
AfD अपनी सख्त प्रवासी नीति और समलैंगिक विवाह को लेकर विरोधी रुख के लिए जानी जाती है। लेकिन पार्टी की सबसे बड़ी नेता एलिस वीडल की निजी जिंदगी उसकी राजनीतिक विचारधारा से बिल्कुल अलग नजर आती है।
एलिस वीडल खुद लेस्बियन हैं और उनकी पार्टनर सारा बोसार्ड का जन्म श्रीलंका में हुआ था। दोनों लंबे समय से साथ हैं और अपने दो बच्चों की परवरिश कर रही हैं। यही वजह है कि वीडल को लेकर अक्सर सवाल उठता है कि आखिर वह ऐसी पार्टी का नेतृत्व कैसे करती हैं, जिसकी कई नीतियां उनकी निजी जिंदगी से टकराती दिखाई देती हैं?
बचपन में नाजी अतीत वाले दादा का साया
एलिस वीडल का जन्म 1979 में पश्चिमी जर्मनी में हुआ था। जर्मन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका परिवार मूल रूप से सिलेसिया क्षेत्र से था, जो अब पोलैंड का हिस्सा है।
उनके दादा हंस वीडल नाजी शासन के दौर में हिटलर की पार्टी से जुड़े हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्हें 1941 में नाजी कब्जे वाले वारसॉ में सैन्य न्यायाधीश बनाया गया था।
युद्ध खत्म होने के बाद वीडल परिवार पश्चिमी जर्मनी चला गया और वहां फर्नीचर के कारोबार से जुड़ गया। एलिस तब बहुत छोटी थीं। उनके मुताबिक, परिवार में उनके दादा की नाजी शासन के दौरान भूमिका को लेकर ज्यादा चर्चा नहीं होती थी।
शिक्षकों को चिढ़ाने के लिए पिता की मर्सिडीज से स्कूल जाती थीं
अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए एलिस वीडल ने बताया है कि उनके स्कूल के कई शिक्षक वामपंथी विचारों से प्रभावित थे। उनका शिक्षकों के साथ ज्यादा अच्छा रिश्ता नहीं था।
वीडल ने बताया कि वह कभी-कभी अपने पिता की मर्सिडीज से स्कूल जाती थीं, जिसे वह शिक्षकों को चिढ़ाने का एक तरीका मानती थीं।
स्कूल के दिनों में वीडल डॉक्टर बनना चाहती थीं, लेकिन उनके पिता ने उन्हें इस पेशे में जाने से मना किया। इसके बाद उन्होंने अर्थशास्त्र और बिजनेस की पढ़ाई की।
पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका करियर बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में शुरू हुआ। उन्होंने अमेरिकी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स में भी काम किया।
चीन में बिताए पांच साल, मंदारिन भाषा भी सीखी
वीडल ने अपने करियर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चीन में बिताया। उन्होंने बैंक ऑफ चाइना में काम किया और करीब पांच साल तक चीन में रहीं।
इस दौरान उन्होंने मंदारिन भाषा सीखी और बिजनेस कंसल्टिंग से भी जुड़ी रहीं। चीन की अर्थव्यवस्था में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और उन्होंने वहां की पेंशन व्यवस्था पर रिसर्च की।
2011 में उन्होंने इसी विषय पर डॉक्टरेट पूरी की और इसके बाद जर्मनी लौट आईं।
राजनीति में कदम रखने से पहले वीडल के पास अर्थशास्त्र, बैंकिंग, अंतरराष्ट्रीय कारोबार और चीन की अर्थव्यवस्था का अच्छा अनुभव था।
पार्टनर ने कहा- राजनीति पर इतनी बातें हैं तो खुद राजनीति में क्यों नहीं जातीं?
एलिस वीडल की निजी जिंदगी भी काफी चर्चा में रही है। 2007 में उनकी मुलाकात सारा बोसार्ड से हुई। सारा स्विट्जरलैंड की फिल्ममेकर हैं और उनका जन्म श्रीलंका में हुआ था।
बताया जाता है कि सारा को बचपन में स्विट्जरलैंड के एक पादरी दंपती ने गोद लिया था। समय के साथ एलिस और सारा की दोस्ती रिश्ते में बदल गई। दोनों 2009 से साथ हैं और स्विट्जरलैंड में अपने दो बच्चों के साथ रहती हैं।
वीडल के मुताबिक, राजनीति में आने का विचार उन्हें सीधे तौर पर सारा से ही मिला था। एक कार्यक्रम में वीडल लगातार यूरोपीय संघ और राजनीति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर रही थीं। उनकी लंबी राजनीतिक बातचीत से परेशान होकर सारा ने उनसे कहा कि अगर राजनीति पर इतनी ही बातें करनी हैं तो उन्हें खुद राजनीति में चले जाना चाहिए।
वीडल के मुताबिक, सारा की यह बात उनके दिमाग में बैठ गई।
2013 में AfD से जुड़ीं
एलिस वीडल वर्ष 2013 में नई-नई बनी AfD में शामिल हुईं। उस समय पार्टी का मुख्य मुद्दा प्रवासी या समलैंगिक विवाह नहीं था। पार्टी यूरो और यूरोजोन संकट के मुद्दे पर ज्यादा मुखर थी।
AfD का तर्क था कि जर्मनी को आर्थिक संकट से जूझ रहे यूरोपीय देशों को लगातार आर्थिक मदद नहीं देनी चाहिए। वीडल भी यूरोपीय आर्थिक नीतियों की आलोचक थीं और इसी वजह से पार्टी से जुड़ीं।
पार्टी में शामिल होने के बाद उनका राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। आर्थिक मामलों पर उनकी पकड़ और मीडिया में पार्टी का पक्ष मजबूती से रखने की क्षमता ने उन्हें AfD के प्रमुख चेहरों में शामिल कर दिया।
2015 के शरणार्थी संकट ने बदली पार्टी की राजनीति
2015 में यूरोप के सामने बड़ा शरणार्थी संकट आया। सीरिया के गृहयुद्ध के साथ अफगानिस्तान, इराक और दूसरे संघर्ष प्रभावित देशों से बड़ी संख्या में लोग यूरोप पहुंचे। जर्मनी भी शरणार्थियों के लिए प्रमुख ठिकाना बना।
इस संकट ने AfD की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। जो पार्टी शुरुआत में यूरो और आर्थिक नीतियों के मुद्दे पर केंद्रित थी, वह धीरे-धीरे प्रवासियों और शरणार्थियों के विरोध के लिए पहचानी जाने लगी।
2016 में पार्टी ने अपना पहला घोषणापत्र जारी किया। इसमें समलैंगिकता और स्कूलों में यौन विविधता से जुड़ी शिक्षा को लेकर भी पार्टी का विरोध सामने आया।
लेस्बियन होकर भी समलैंगिक विवाह के खिलाफ क्यों?
यही वह मुद्दा है, जिस पर एलिस वीडल को सबसे ज्यादा सवालों का सामना करना पड़ता है।
एक तरफ वह खुद एक महिला के साथ रिश्ते में हैं और अपने परिवार के साथ रहती हैं। दूसरी तरफ वह ऐसी पार्टी की नेता हैं, जो समलैंगिक विवाह और कुछ LGBTQ अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर विरोधी रुख रखती है।
वीडल का तर्क है कि उनकी निजी पहचान और पार्टी की राजनीतिक नीतियां अलग-अलग मुद्दे हैं। वह समलैंगिक विवाह की कानूनी मान्यता के विरोध में रही हैं, लेकिन समलैंगिक जोड़ों के लिए कानूनी पार्टनरशिप का समर्थन करती हैं।
वीडल का यह भी तर्क रहा है कि जर्मनी में समलैंगिक लोगों की सुरक्षा का मुद्दा महत्वपूर्ण है। वह प्रवासन पर सख्त नियंत्रण को समलैंगिक लोगों की सुरक्षा से जोड़कर देखती हैं और दावा करती हैं कि कुछ मुस्लिम समूहों से समलैंगिक लोगों को खतरा हो सकता है।
इसी आधार पर वह अपनी निजी जिंदगी और AfD की प्रवासी विरोधी नीतियों के बीच विरोधाभास को खारिज करती हैं।
AfD का सबसे बड़ा चेहरा बनीं वीडल
पार्टी में तेजी से आगे बढ़ते हुए वीडल AfD की सबसे प्रमुख नेताओं में शामिल हो गईं। आर्थिक मामलों की समझ, तेज राजनीतिक बयानबाजी और मीडिया में प्रभावी तरीके से पार्टी का पक्ष रखने की क्षमता ने उनकी भूमिका मजबूत की।
अब AfD के बढ़ते जनसमर्थन के साथ एलिस वीडल का कद भी जर्मनी की राजनीति में तेजी से बढ़ा है।
क्या एलिस वीडल बन सकती हैं जर्मनी की अगली चांसलर?
AfD की शुरुआत 2013 में हुई थी। उस समय पार्टी को राष्ट्रीय चुनाव में करीब 4.7% वोट मिले थे। इसके बाद पार्टी का जनाधार लगातार बढ़ता गया।
2026 में सैक्सोनी-आनहाल्ट में पार्टी के मजबूत प्रदर्शन ने AfD को जर्मनी की राजनीति के केंद्र में ला दिया है। पूर्वी जर्मनी के कई राज्यों में पार्टी का प्रभाव खास तौर पर मजबूत माना जाता है।
हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती अब भी सरकार बनाने की है। जर्मनी की प्रमुख पार्टियां लंबे समय से AfD के साथ गठबंधन करने से इनकार करती रही हैं। इसलिए केवल ज्यादा वोट हासिल करना वीडल के लिए चांसलर बनने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
उन्हें सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों का समर्थन भी हासिल करना होगा। यही तय करेगा कि AfD का बढ़ता जनाधार एलिस वीडल को जर्मनी की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाता है या नहीं।

