अमेरिका-सऊदी डील पर बड़ा खुलासा! क्या सिविल न्यूक्लियर की आड़ में परमाणु बम बनाएगा सऊदी?
सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका में चिंता बढ़ गई है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब ने भविष्य में परमाणु हथियार बनाने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि अभी तक सऊदी अरब ने परमाणु बम बनाने का कोई फैसला नहीं लिया है।अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह जानकारी अमेरिकी संसद के साथ साझा की गई है। यह मामला अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए नए असैन्य परमाणु सहयोग समझौते के बाद चर्चा में आया है। इस समझौते के तहत सऊदी अरब में परमाणु ऊर्जा से जुड़ा बुनियादी ढांचा विकसित किया जाना है।
चिंता की सबसे बड़ी वजह यूरेनियम एनरिचमेंट से जुड़ी तकनीक है। परमाणु बिजली के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन को तैयार करने में यूरेनियम एनरिचमेंट की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित व्यवस्था के तहत सऊदी अरब को यूरेनियम एनरिचमेंट की क्षमता हासिल हो सकती है। हालांकि बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला स्तर परमाणु हथियार के लिए जरूरी स्तर से काफी अलग होता है।
अमेरिकी सांसदों के बीच सवाल यह है कि अगर सऊदी अरब का उद्देश्य केवल शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा विकसित करना है, तो उसे अपने देश में यूरेनियम एनरिचमेंट की सुविधा की जरूरत क्यों है। कुछ सांसदों ने इसी आधार पर परमाणु समझौते को लेकर चिंता जताई है और अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की मांग की है।
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए उसी दिशा में आगे बढ़ सकता है। हालांकि, मौजूदा अमेरिकी रिपोर्ट का मतलब यह नहीं है कि रियाद ने परमाणु हथियार बनाने का फैसला कर लिया है।
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि सऊदी अरब के साथ परमाणु समझौते का उद्देश्य शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा विकसित करना है। अमेरिका का दावा है कि इस सहयोग को अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार नियमों और सुरक्षा मानकों के तहत रखा जाएगा।
इस परमाणु समझौते की पृष्ठभूमि भी काफी महत्वपूर्ण है। इसकी बातचीत की शुरुआत पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में हुई थी। उस समय अमेरिका चाहता था कि परमाणु सहयोग और सुरक्षा संबंधी समझौते के साथ सऊदी अरब इजराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित करे।
लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजराइल पर हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध के चलते यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने परमाणु सहयोग और इजराइल-सऊदी संबंधों के मुद्दों को अलग-अलग रखने की रणनीति अपनाई।
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुआ परमाणु सहयोग समझौता लंबी अवधि के लिए है और इसके तहत अमेरिकी कंपनियों की भी बड़ी भूमिका हो सकती है। अमेरिकी संसद समझौते की समीक्षा कर रही है और तय समय के भीतर इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाता है तो यह आगे लागू हो सकता है।सऊदी अरब पहले से ही NPT यानी न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी का सदस्य है। इस व्यवस्था के तहत परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल की अनुमति है, जबकि परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय निगरानी और प्रतिबद्धताएं लागू होती हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सऊदी अरब अपने परमाणु कार्यक्रम को किस सीमा तक विकसित करता है और अमेरिका किस तरह की निगरानी और सुरक्षा शर्तें लागू करता है। अगर भविष्य में रियाद परमाणु हथियारों की दिशा में आगे बढ़ता है, तो इसका असर केवल अमेरिका-सऊदी संबंधों पर नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा और परमाणु अप्रसार व्यवस्था पर पड़ सकता है।

