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23 साल की राजनीतिक कहानी: रूस के साथ नजदीकी रखने वाले इन 7 नेताओं का अमेरिका ने किया काम तमाम

23 साल की राजनीतिक कहानी: रूस के साथ नजदीकी रखने वाले इन 7 नेताओं का अमेरिका ने किया काम तमाम

पिछले दो दशकों में एक चौंकाने वाला पैटर्न सामने आया है। जो नेता रूस के करीब थे, उनकी सरकारें एक के बाद एक गिर गईं। 2003 से 2026 तक, सात देशों में रूस समर्थक नेताओं को सत्ता से हटा दिया गया या उनका शासन खत्म हो गया। हर मामले में, अमेरिका की भूमिका या तो सीधे तौर पर दिखाई दे रही थी या पर्दे के पीछे से निभाई गई थी। आइए देखें कि कैसे ये सात नेता, जो कभी अपने-अपने देशों में शक्तिशाली थे, अमेरिकी रणनीति का शिकार बने।

1. सद्दाम हुसैन (इराक, 2003)

सद्दाम हुसैन सोवियत संघ और बाद में रूस के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक थे। 1980 से 1988 तक ईरान-इराक युद्ध के दौरान, सोवियत संघ ने सद्दाम को 40 अरब डॉलर की सैन्य सहायता दी थी। इराक को मिली कुल विदेशी सहायता का 60% सोवियत गुट से आया था। इसमें 800 T-72 टैंक, 300 लड़ाकू विमान और सैकड़ों मिसाइलें शामिल थीं। 20 मार्च, 2003 को अमेरिका और ब्रिटेन ने ऑपरेशन इराकी फ्रीडम शुरू किया। इराक पर बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियार रखने का आरोप लगाया गया था। 9 अप्रैल, 2003 को सद्दाम को सत्ता से हटा दिया गया। उन्हें 13 दिसंबर, 2003 को गिरफ्तार किया गया और 30 दिसंबर, 2006 को फाँसी दे दी गई। एक इराकी अदालत ने नवंबर 2006 में उन्हें 1982 में दुजैल शहर में 148 विरोधियों की हत्या के लिए मौत की सजा सुनाई थी।

2. एडुआर्ड शेवर्नडज़े (जॉर्जिया, 2003)
शेवर्नडज़े 1985 से 1991 तक सोवियत विदेश मंत्री थे और मिखाइल गोर्बाचेव के करीबी सहयोगी थे। वह 1995 में जॉर्जिया के राष्ट्रपति बने। हालाँकि वह पूरी तरह से रूस समर्थक नहीं थे, फिर भी जॉर्जिया रूस के प्रभाव क्षेत्र में था। संसदीय चुनावों में धांधली के आरोपों के बाद नवंबर 2003 में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विपक्षी नेता मिखाइल साकाशविली ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। 23 नवंबर, 2003 को प्रदर्शनकारियों ने संसद पर धावा बोल दिया। शेवर्नडज़े भाग गए और इस्तीफा दे दिया। 4 जनवरी, 2004 को साकाशविली 96% वोटों के साथ राष्ट्रपति चुने गए। अमेरिकी NGO और जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन ने जॉर्जिया में लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए। सत्ता में आने के बाद, साकाशविली ने तुरंत NATO में शामिल होने की कोशिशें शुरू कर दीं, रूसी मिलिट्री बेस बंद करने की मांग की, और पश्चिम के साथ संबंध मज़बूत किए।

3. विक्टर यानुकोविच (यूक्रेन, 2014)

यानुकोविच रूस के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक थे। नवंबर 2013 में, उन्होंने यूरोपियन यूनियन एसोसिएशन एग्रीमेंट पर साइन करने से मना कर दिया। इसके बजाय, उन्होंने रूस से $15 बिलियन की मदद स्वीकार कर ली। 21 नवंबर, 2013 को, EU समझौते को ठुकराने के खिलाफ़ कीव के मैदान स्क्वायर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इसे मैदान क्रांति के नाम से जाना गया। फरवरी 2014 तक, विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए, जिसमें 130 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई। 22 फरवरी, 2014 को, यानुकोविच रूस भाग गए। पश्चिम समर्थक अंतरिम सरकार सत्ता में आई। फरवरी 2014 में, अमेरिकी विदेश उप मंत्री विक्टोरिया नूलैंड और अमेरिकी राजदूत के बीच एक फोन कॉल लीक हुआ, जिसमें वे इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि नई यूक्रेनी सरकार में किसे नियुक्त किया जाना चाहिए। नूलैंड ने कहा कि "याट्स" सबसे अच्छा व्यक्ति होगा। यह आर्सेनी यात्सेन्युक थे, जो बाद में प्रधानमंत्री बने। अमेरिकी सरकार ने यूक्रेन में विपक्ष को लाखों डॉलर की मदद दी।

4. सर्झ सर्गस्यान (आर्मेनिया, 2018)

आर्मेनिया रूस का पारंपरिक सहयोगी था। आर्मेनिया के ग्युमरी में एक रूसी सैन्य अड्डा था, जहाँ 3,000 से ज़्यादा सैनिक तैनात थे। सर्झ सर्गस्यान 2008 से आर्मेनिया में सत्ता में थे और उन्हें रूस के करीब माना जाता था। अप्रैल 2018 में, सर्गस्यान ने राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री बनने की कोशिश की। लोगों ने इसे सत्ता में बने रहने की चाल समझा। 23 अप्रैल 2018 को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। विपक्षी नेता निकोल पशिन्यान ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। 23 अप्रैल 2018 को सर्गस्यान ने इस्तीफा दे दिया। 8 मई 2018 को पशिन्यान प्रधानमंत्री बने। पशिन्यान पश्चिमी देशों के समर्थक नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने रूस पर निर्भरता कम करने की कोशिश की और यूरोपीय संघ के साथ संबंध मजबूत किए। सितंबर में, नागोर्नो-काराबाख को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच संघर्ष छिड़ गया। पशिन्यान ने नागोर्नो-काराबाख अज़रबैजान को सौंप दिया, जिससे रूस-आर्मेनिया संबंध और खराब हो गए। इस मामले में, अमेरिका ने अज़रबैजान के साथ स्थिति को शांत करने के लिए हस्तक्षेप किया। सितंबर 2023 में, अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव को फोन किया और उनसे आर्मेनिया पर और हमला न करने को कहा। अब अज़रबैजान और आर्मेनिया दोनों अमेरिका के करीब हैं। काकेशस में रूस का प्रभाव कम हो गया है।

5. बशर अल-असद (सीरिया, 2024)
सीरिया रूस का सबसे पुराना और सबसे करीबी सहयोगी था। 1971 से टार्टस में एक रूसी नौसैनिक अड्डा था। यह भूमध्य सागर में रूस का एकमात्र अड्डा था। 2015 से खेमीमिम में एक रूसी एयरबेस है। 2020 में, जब ISIS और विद्रोहियों ने लगभग असद की सरकार को गिरा दिया था, तो रूसी हवाई हमलों ने असद को बचाया। रूसी जेट, क्रूज मिसाइलों और हजारों सैनिकों ने युद्ध का रुख बदल दिया। 27 नवंबर 2024 को, विद्रोहियों ने अचानक अलेप्पो पर हमला कर दिया। सिर्फ 11 दिनों में, विद्रोहियों ने दमिश्क पर कब्जा कर लिया। असद को सीरिया छोड़कर रूस में शरण लेनी पड़ी। अहमद अल-शारा सीरिया के राष्ट्रपति बने। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ बातचीत शुरू की। अमेरिका ने सीरिया में 900 से ज़्यादा सैनिक रखे हुए थे और कुर्द बलों (SDF) को हथियार और ट्रेनिंग दी थी। जनवरी 2025 में, ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिया कि वह नई सीरियाई सरकार के साथ काम करने के लिए तैयार है।

6. निकोलस मादुरो (वेनेजुएला, 2026)
वेनेजुएला लैटिन अमेरिका में रूस का सबसे करीबी सहयोगी था। इसने 2005 और 2019 के बीच रूस से $17 बिलियन के हथियार खरीदे। वेनेजुएला पर रूस का लगभग $4 बिलियन का कर्ज़ भी है। रूसी तेल कंपनी रोसनेफ्ट ने वेनेजुएला के तेल प्रोजेक्ट्स में निवेश किया। 2019 में, रूस ने वेनेजुएला को S-300 मिसाइल सिस्टम भेजे। वेनेजुएला ने यूक्रेन पर रूसी हमले का भी समर्थन किया। मादुरो 2013 से 2026 तक वेनेजुएला में सत्ता में रहे। 3 जनवरी 2026 को, अमेरिकी स्पेशल यूनिट ने काराकास में मादुरो के घर पर छापा मारा। मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर फ्लोरिडा ले जाया गया।

7. अगला निशाना: ईरान और उत्तर कोरिया
ईरान रूस का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है। ईरान ने यूक्रेन में युद्ध के लिए रूस को शाहेद ड्रोन भी बेचे। इस बीच, उत्तर कोरिया रूस का आखिरी बचा हुआ एशियाई सहयोगी है। यूक्रेन में 10,000 से ज़्यादा उत्तर कोरियाई सैनिक रूस की तरफ से लड़ रहे हैं। अमेरिका ने ईरान पर संभावित हमले का संकेत दिया है।

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