राजा-महाराजाओं के दौर में कैसा दिखता था राजस्थान ? 3 मिनट के इस ब्लैक एंड वाइट वीडियो में देखे अनोखा नजारा
जयपुर, जोधपुर, उदयपुर – आज जिन शहरों को आधुनिक विकास और पर्यटन की नजरों से देखा जाता है, वो कभी भारत की शाही विरासत का जिंदा प्रतीक हुआ करते थे। आज से करीब 100 साल पहले, यानी 1920 के दशक में राजस्थान एक संप्रभु राज्य नहीं था, बल्कि यह कई स्वतंत्र रियासतों में बंटा हुआ था। हर रियासत का अपना राजा होता था, और उसका अलग दरबार, सेनाएं, संस्कृति और परंपराएं।
शाही ठाठ की मिसाल थे पुराने राजमहल
100 साल पहले राजस्थान की सबसे बड़ी पहचान उसके भव्य किले, महल और हवेलियां थीं। जयपुर के सिटी पैलेस से लेकर उदयपुर के सिटी पैलेस और जोधपुर का उम्मेद भवन – इन इमारतों की भव्यता और स्थापत्य कला आज भी पर्यटकों को हैरान कर देती है। उस समय ये महल सिर्फ रहने के स्थान नहीं थे, बल्कि ये शासन, राजनीति, न्याय और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के केंद्र हुआ करते थे।राजाओं के दरबारों में मूक बंधन नहीं होता था, बल्कि वहां संगीत, कवित्व, बहस और कला की भरमार होती थी। ये महल उस युग की ताकत, ऐश्वर्य और परंपरा के प्रतीक थे।
घोड़ों की टाप और ऊंटों की चाल
1920 के दशक में राजस्थान में सड़कों का विकास बेहद सीमित था। परिवहन का मुख्य साधन घोड़े, ऊंट, बैलगाड़ियां और हाथी होते थे। खासतौर पर रियासतों में शाही सवारी के रूप में हाथी और ऊंटों का इस्तेमाल किया जाता था। आम लोगों के लिए बैलगाड़ी ही मुख्य साधन थी। रेल मार्ग कुछ रियासतों में स्थापित हो चुका था, लेकिन उसका उपयोग सीमित वर्ग ही करता था।
क्या पहनते थे लोग?
उस दौर में राजस्थानियों की पोशाकें जलवेदार और पारंपरिक हुआ करती थीं। पुरुष आमतौर पर धोती-कुर्ता, अंगरखा और साफा (पगड़ी) पहनते थे। महिलाओं की पारंपरिक पोशाक घाघरा-चोली और ओढ़नी होती थी, जिसमें बारीक कढ़ाई और गोटा-पट्टी का काम होता था। राजपरिवारों की महिलाओं के वस्त्रों में कीमती रेशम, सोने की कढ़ाई और मोतियों का इस्तेमाल होता था।
खानपान की शाही झलक
100 साल पहले के राजस्थान में खानपान में भी परंपरा और स्वाद का अनोखा संगम था। उस समय राज परिवारों में शिकार की गई बकरी या जंगली जानवरों का मांस "सोला" या "लााल मास" के रूप में परोसा जाता था। आम जनता बाजरे की रोटी, केर-सांगरी, दाल-बाटी-चूरमा, चने की सब्जी और छाछ से ही पेट भरती थी।राजमहलों में खास पकवानों के लिए अलग रसोइये होते थे, जो "शाही बावर्ची" कहलाते थे। उन्हें हर व्यंजन में स्वाद और आयुर्वेदिक गुणों का संतुलन बनाकर भोजन तैयार करने में महारत हासिल होती थी।
शिक्षा और जीवनशैली
राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था भी सामाजिक वर्गों पर आधारित थी। राजघराने के बच्चों को घर पर ही पंडितों और अंग्रेजी ट्यूटरों से शिक्षा दी जाती थी। वहीं आम लोग गुरुकुल, मदरसे या गांव के विद्यालयों में पढ़ते थे। लड़कियों की शिक्षा पर समाज में विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था।राजघराने के युवराजों को युद्ध कौशल, राजनीति, कूटनीति और घुड़सवारी में पारंगत किया जाता था। वहीं आम परिवारों के युवक खेती, पशुपालन और पारंपरिक व्यवसायों में लग जाते थे।
ब्रिटिश प्रभाव और राजनीतिक व्यवस्था
1920 के दशक का राजस्थान ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था, लेकिन यहां की रियासतें अर्धस्वतंत्र थीं। ब्रिटिश सरकार को राजस्व और राजनीतिक समर्थन देने के बदले, राजाओं को उनकी गद्दी पर बने रहने की अनुमति दी जाती थी। इस व्यवस्था को 'प्रिंसली स्टेट्स' कहा जाता था। राजस्थान में 22 से अधिक ऐसी रियासतें थीं जिनके अपने झंडे, मुद्रा और प्रशासनिक नियम होते थे।हालांकि, कई रियासतों में अंग्रेज़ों की सहमति से दीवान (मुख्यमंत्री) या पॉलिटिकल एजेंट तैनात किए जाते थे जो प्रशासन को नियंत्रित करते थे।
त्योहार, मेलों और परंपराओं की समृद्ध विरासत
राजस्थान आज भी त्योहारों और मेलों के लिए मशहूर है, लेकिन 100 साल पहले ये आयोजन और भी भव्य और सामूहिक हुआ करते थे। हर रियासत का अपना ‘दशहरा’, ‘गणगौर’, ‘तीज’ और ‘ऊँट मेला’ होता था, जिनमें आम जनता के साथ-साथ राजा-महाराजा भी भाग लेते थे।राजा स्वयं पालकी या हाथी पर बैठकर नगर भ्रमण करते थे और जनता पर फूलों की वर्षा करते थे। यह आम जनता के लिए शाही परिवार से मिलने का एकमात्र अवसर होता था।
निष्कर्ष:
आज का राजस्थान आधुनिकता और विरासत का अद्भुत संगम है, लेकिन अगर हम 100 साल पीछे लौटें, तो यह धरती शौर्य, शान और परंपराओं की अनमोल मिसाल थी। रियासतों की उस दुनिया में जीवन भले ही कठिन था, लेकिन आत्मगौरव, कला-संस्कृति और पहचान की गरिमा हर कदम पर झलकती थी। उस दौर की झलक आज भी हमें किलों, हवेलियों, रीति-रिवाजों और लोकगीतों के माध्यम से महसूस होती है।

