बागियों की नदी चंबल, जिसके पानी में दिखती है घड़ियालों की दुनिया; दो मिनट के वीडियो में जानिए श्राप से लेकर अभयारण्य तक की कहानी
चंबल नदी का नाम आते ही मध्य भारत के बीहड़, डाकुओं की कहानियां और घड़ियालों से भरी नदी की तस्वीर सामने आती है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से होकर बहने वाली चंबल को लंबे समय से ‘बागियों की नदी’ के नाम से भी जाना जाता रहा है। इसके आसपास के दुर्गम बीहड़ों ने कभी ऐसे लोगों को पनाह दी, जिनकी कहानियां देशभर में चर्चित रहीं। लेकिन चंबल की पहचान सिर्फ बीहड़ों और बागियों तक सीमित नहीं है। यह नदी अपने अनोखे जलीय जीवों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी खास है।
चंबल को लेकर कई पौराणिक मान्यताएं
चंबल नदी से जुड़ी कई लोककथाएं और पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के मुताबिक इसका संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है। कथा में कहा जाता है कि द्रौपदी ने किसी घटना के बाद चंबल को श्राप दिया था। हालांकि, यह धार्मिक और लोकपरंपरा से जुड़ी कथा है, जिसका ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
एक दूसरी लोककथा चंबल के उद्गम को राजा रंतिदेव से जोड़ती है। मध्य प्रदेश पर्यटन की वेबसाइट भी चंबल के बारे में प्रचलित उस किंवदंती का उल्लेख करती है, जिसमें नदी को हजारों गायों के बलिदान से निकले रक्त से जोड़कर बताया जाता है।
इन्हीं कथाओं के चलते चंबल को लेकर लोगों के बीच लंबे समय से रहस्य और रोमांच बना हुआ है।
बीहड़ों ने दिया ‘बागियों की नदी’ नाम
चंबल नदी के दोनों किनारों पर फैले गहरे बीहड़ इस क्षेत्र की सबसे अलग पहचान हैं। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण लंबे समय तक यहां पहुंचना मुश्किल रहा। इन्हीं बीहड़ों में कई दशकों तक डकैत गिरोह सक्रिय रहे। फूलन देवी समेत कई चर्चित नाम चंबल के बीहड़ों की कहानियों से जुड़े रहे हैं।
हालांकि आज का चंबल क्षेत्र केवल अपराध की पुरानी कहानियों के लिए नहीं जाना जाता। यहां बड़े स्तर पर वन्यजीव संरक्षण का काम हो रहा है और नदी का एक बड़ा हिस्सा संरक्षित क्षेत्र में आता है।
घड़ियाल बताते हैं चंबल की असली पहचान
चंबल की सबसे बड़ी प्राकृतिक खासियत यहां पाए जाने वाले घड़ियाल हैं। वर्ष 1979 में राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को अधिसूचित करने का प्रमुख उद्देश्य संकटग्रस्त घड़ियालों का संरक्षण था। उत्तर प्रदेश ईको-टूरिज्म बोर्ड के अनुसार अभयारण्य में घड़ियाल के अलावा गंगा डॉल्फिन, कछुओं की कई प्रजातियां, ऊदबिलाव और विभिन्न प्रकार की मछलियां भी पाई जाती हैं।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के तीन राज्यों में फैला हुआ है। यह नदी के लंबे प्रवाह क्षेत्र और उसके आसपास के बीहड़ों को अपने संरक्षण क्षेत्र में समेटता है।
गंगा डॉल्फिन और कई दुर्लभ जीवों का घर
चंबल नदी सिर्फ घड़ियालों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। यहां संकटग्रस्त गंगा डॉल्फिन भी पाई जाती है। इसके अलावा स्मूथ-कोटेड ऊदबिलाव, कछुओं की कई प्रजातियां और बड़ी संख्या में मछलियां इस नदी के पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं।
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के अनुसार राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में संरक्षण प्रयासों के चलते घड़ियालों की संख्या बढ़ाने के लिए लंबे समय से काम किया गया है। बीहड़ों का प्राकृतिक नेटवर्क भी नदी और वन्यजीवों को सुरक्षा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
तीन राज्यों को जोड़ती है चंबल
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच फैला हुआ है। उत्तर प्रदेश के आधिकारिक ईको-टूरिज्म बोर्ड के मुताबिक अभयारण्य का क्षेत्र कोटा बैराज के डाउनस्ट्रीम से लेकर भरेह तक फैला है, जहां चंबल और यमुना का संगम होता है।
इस तरह चंबल एक ऐसी नदी है, जिसकी पहचान में इतिहास, लोककथाएं, बीहड़ और वन्यजीव संरक्षण सभी एक साथ दिखाई देते हैं। कभी बागियों की कहानियों से चर्चित रही यह नदी आज घड़ियाल और गंगा डॉल्फिन जैसे दुर्लभ जीवों के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

