वीडियो में जाने चित्तौड़गढ़ किले की जौहर गाथा, जहाँ रानी पद्मिनी के साथ हजारो क्षत्राणियों ने किया था आत्मदाह
भारत के इतिहास में कुछ स्थल ऐसे हैं जो अपने गौरव, बलिदान और वीरता की गाथाओं के लिए सदा के लिए अमर हो गए हैं। राजस्थान का चित्तौड़गढ़ फोर्ट (Chittorgarh Fort) उन गिने-चुने स्थलों में से एक है, जहां इतिहास ने कई बार खुद को वीरता और बलिदान के स्वर्ण अक्षरों में लिखा। आज भी यह किला भारत के शौर्य और सम्मान का प्रतीक बना हुआ है, और विशेषकर 'जौहर गाथा' की वजह से इसका नाम इतिहास में सुनहरे पन्नों में अंकित है।
इतिहास की गवाही देता किला
चित्तौड़गढ़ फोर्ट, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में शामिल है, सातवीं शताब्दी में बना था। मौर्य वंश के शासकों ने इसकी नींव रखी और समय के साथ यह मेवाड़ के सिसोदिया राजपूतों का प्रमुख गढ़ बन गया। इस किले का क्षेत्रफल लगभग 700 एकड़ में फैला है और यह राजस्थान का सबसे बड़ा किला है। किले में विजय स्तम्भ, कीर्ति स्तम्भ, रानी पद्मिनी महल और मीरा बाई मंदिर जैसी ऐतिहासिक धरोहरें मौजूद हैं, जो आज भी सैलानियों और इतिहास प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।
जौहर: अस्मिता की रक्षा का प्रतीक
चित्तौड़गढ़ की जौहर गाथा भारतीय इतिहास में नारी सम्मान और बलिदान का अद्वितीय उदाहरण है। 'जौहर' शब्द का अर्थ होता है - युद्ध में पराजय के समय महिलाओं द्वारा अपने सम्मान की रक्षा हेतु सामूहिक अग्नि प्रवेश। चित्तौड़ में तीन प्रमुख जौहर हुए — रानी पद्मिनी, रानी कर्णावती और अन्य वीरांगनाओं ने अग्नि कुंड में कूदकर अपने स्वाभिमान की रक्षा की।पहला जौहर 1303 ईस्वी में हुआ, जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी के सौंदर्य की ख्याति सुनकर चित्तौड़ पर आक्रमण किया। राजपूत वीर राणा रतन सिंह ने अपनी अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी, लेकिन जब पराजय निश्चित हो गई, तब रानी पद्मिनी ने सैकड़ों अन्य महिलाओं के साथ जौहर कर लिया। यह बलिदान आज भी भारतीय इतिहास में स्त्री शक्ति और स्वाभिमान का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।दूसरा जौहर 1535 ईस्वी में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के दौरान हुआ। रानी कर्णावती के नेतृत्व में हजारों महिलाओं ने जौहर किया और पुरुषों ने 'शाका' (युद्ध में मरने के लिए आखिरी लड़ाई) किया। तीसरा और अंतिम जौहर 1568 ईस्वी में अकबर के आक्रमण के समय हुआ।
आज भी जीवंत है वह गाथा
आज चित्तौड़गढ़ का किला न केवल स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस भावना का जीवंत प्रतीक भी है, जो स्वाभिमान, बलिदान और सम्मान पर आधारित है। यहां हर ईंट, हर दीवार, हर महल एक कहानी सुनाता है। विजय स्तम्भ पर उकेरी गई राजपूत योद्धाओं की कथाएं, पद्मिनी महल की जलराशि में प्रतिबिंबित होते हुए इतिहास के दृश्य — सब कुछ मानो आज भी जिंदा है।हर साल हजारों पर्यटक देश और दुनिया से इस किले को देखने आते हैं। खासकर 'जौहर मेला', जो फाल्गुन में आयोजित होता है, चित्तौड़ की वीरांगनाओं के बलिदान को याद करने का एक विशेष अवसर बन चुका है। इस मेले में हजारों श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं और चित्तौड़ के गौरवशाली अतीत को सम्मानपूर्वक नमन करते हैं।
समकालीन सन्दर्भ में चित्तौड़गढ़
आज के समय में जब वैश्विकरण और आधुनिकता ने हमारी सोच और जीवनशैली को व्यापक रूप से बदल दिया है, चित्तौड़गढ़ फोर्ट हमें अपनी जड़ों से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। यह न केवल एक पर्यटन स्थल है, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा भी है — कि स्वाभिमान और सम्मान के लिए किस तरह संघर्ष किया जाता है।राजस्थान सरकार ने भी इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में विशेष प्रयास किए हैं। 'लाइट एंड साउंड शो' के जरिए किले के अंदर प्रतिदिन चित्तौड़ के गौरवशाली इतिहास को जीवंत प्रस्तुत किया जाता है, जो आगंतुकों को रोमांचित कर देता है।
निष्कर्ष
चित्तौड़गढ़ फोर्ट केवल पत्थरों का ढांचा नहीं है; यह एक विचार है, एक भावना है और एक ऐसी विरासत है जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सबका दायित्व है। जौहर गाथा सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह नारी सम्मान, स्वाभिमान और बलिदान की वह मशाल है, जो आज भी हमारी चेतना को प्रेरित करती है।जब भी चित्तौड़गढ़ फोर्ट की ऊंची प्राचीरों को देखा जाए, उन धधकती अग्निकुंडों की ज्वाला आज भी महसूस की जा सकती है, जिसमें हजारों वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर एक अमर इतिहास रचा।

