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अहंकार का त्याग कैसे करें? ओशो के विचारों में ‘ईगो’ से मुक्ति का रास्ता

अहंकार का त्याग कैसे करें? ओशो के विचारों में ‘ईगो’ से मुक्ति का रास्ता

ओशो के दर्शन में अहंकार को कोई ऐसी चीज नहीं माना जाता जिसे जबरदस्ती खत्म करना है, बल्कि उसे समझना है। उनके अनुसार जब व्यक्ति अपने भीतर उठने वाले विचारों, इच्छाओं, तुलना और ‘मैं’ की भावना को बिना निर्णय किए देखना शुरू करता है, तो अहंकार धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।

1. खुद को दूसरों से तुलना करना छोड़ें

अहंकार की एक बड़ी जड़ तुलना है—मैं उससे बेहतर हूं, वह मुझसे आगे है, लोग मुझे कितना सम्मान देते हैं। ओशो के विचारों में तुलना व्यक्ति को अपने वास्तविक अस्तित्व से दूर ले जाती है।

जब आप किसी दूसरे व्यक्ति से अपनी तुलना करते हैं, तो भीतर या तो श्रेष्ठ होने का भाव आता है या हीनता का। दोनों ही अहंकार के रूप हैं।

अपने आप को केवल अपने कल से तुलना करें।

2. अपने विचारों को देखना शुरू करें

ओशो की ध्यान पद्धति में साक्षीभाव महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है—विचारों को रोकना नहीं, बल्कि उन्हें देखना।

जब मन कहे—

“उसने मेरा अपमान कैसे कर दिया?”

तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय देखें कि भीतर क्या हो रहा है। क्रोध उठ रहा है, शरीर में तनाव है, मन जवाब देना चाहता है।

बस उसे देखें।

धीरे-धीरे आपको समझ आने लगेगा कि आप विचार नहीं हैं और आप अपनी भावनाएं भी नहीं हैं। आप उनके साक्षी हो सकते हैं।

3. सम्मान पाने की भूख को पहचानें

अहंकार चाहता है कि दूसरे हमें महत्व दें, हमारी तारीफ करें और हमारी बात को सही मानें।

एक दिन प्रयोग करके देखें—अगर कोई आपकी तारीफ न करे तो क्या आप फिर भी खुश रह सकते हैं?

यदि हां, तो आप भीतर से स्वतंत्र होने लगे हैं।

ओशो के दृष्टिकोण में बाहरी मान्यता पर निर्भरता कम होना आंतरिक स्वतंत्रता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

4. हर बहस जीतना जरूरी नहीं

अहंकार को अपनी बात सही साबित करना पसंद है।

कई बार हम जानते हैं कि सामने वाला गलत नहीं है, फिर भी अपनी बात मनवाने के लिए बहस करते रहते हैं।

ऐसे समय खुद से पूछें:

“क्या मुझे सच चाहिए या सिर्फ जीतना है?”

यह सवाल अहंकार को पहचानने में बहुत मदद कर सकता है।

5. अपनी गलतियों को स्वीकार करें

अहंकार कहता है—“मैं गलत नहीं हो सकता।”

लेकिन जागरूक व्यक्ति कह सकता है—

“हां, मुझसे गलती हुई।”

अपनी गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं है। यह भीतर की मजबूती है। जब आपको अपने बारे में एक निश्चित छवि बनाए रखने की जरूरत नहीं रहती, तो अहंकार की पकड़ कमजोर होने लगती है।

6. अकेले में खुद को देखें

कुछ समय बिना मोबाइल, टीवी और बातचीत के शांत बैठें। मन बेचैन होगा। पुराने विचार आएंगे। किसी व्यक्ति की याद आएगी। कुछ करने की इच्छा होगी।

उन्हें दबाने की कोशिश न करें।

बस देखें।

यही साक्षीभाव का अभ्यास है।

धीरे-धीरे आपको पता चल सकता है कि जिस ‘मैं’ को आप बहुत वास्तविक समझते थे, उसमें विचारों, यादों, इच्छाओं और दूसरों की राय का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है।

7. अहंकार से लड़िए मत

यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।

“मुझे अहंकार खत्म करना है”—यह सोच भी अहंकार का नया रूप बन सकती है।

इसलिए अहंकार को दुश्मन मत बनाइए।

जब अहंकार दिखाई दे, उसे पहचानिए।

जब क्रोध आए, उसे देखिए।

जब प्रशंसा की इच्छा हो, उसे देखिए।

जब अपमान का दर्द हो, उसे देखिए।

देखना ही परिवर्तन की शुरुआत है।

ओशो के विचारों को एक वाक्य में समझें

ओशो की ध्यान-दृष्टि का सार इस तरह समझा जा सकता है:

अहंकार को मिटाने की कोशिश मत करो; उसे इतनी जागरूकता से देखो कि उसकी पकड़ अपने आप ढीली पड़ने लगे।

और शायद सबसे सुंदर अभ्यास यह है—

“मैं कौन हूं?”

इस प्रश्न का तुरंत कोई जवाब मत दीजिए। बस शांत होकर इस प्रश्न के साथ बैठिए।

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