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Horniman Circle: मुंबई की इस मशहूर जगह का नाम एक अंग्रेज के नाम पर क्यों रखा गया? जानिए आजादी से जुड़ी दिलचस्प कहानी

Horniman Circle: मुंबई की इस मशहूर जगह का नाम एक अंग्रेज के नाम पर क्यों रखा गया? जानिए आजादी से जुड़ी दिलचस्प कहानी

मुंबई अपनी ऊंची इमारतों, ऐतिहासिक इमारतों और मशहूर पर्यटन स्थलों के लिए जानी जाती है। यहां कई ऐसी जगहें हैं, जिनका इतिहास भारत की आजादी की लड़ाई से जुड़ा हुआ है। इन्हीं में से एक है साउथ मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित हॉर्निमन सर्कल। यह जगह अपनी खूबसूरत ऐतिहासिक इमारतों और खास पहचान के लिए मशहूर है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस जगह का नाम एक अंग्रेज पत्रकार के नाम पर रखा गया है, जिसने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई थी?

दिलचस्प बात यह है कि हॉर्निमन सर्कल का नाम आजादी से पहले नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता के बाद रखा गया था। इसके पीछे एक ऐसे अंग्रेज पत्रकार की कहानी है, जिसने भारतीयों के अधिकारों के समर्थन में अपनी कलम का इस्तेमाल किया। आइए जानते हैं हॉर्निमन सर्कल का इतिहास और आखिर इस जगह का नाम एक अंग्रेज के नाम पर क्यों पड़ा।

पहले एल्फिंस्टन सर्कल के नाम से जानी जाती थी यह जगह

मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित इस ऐतिहासिक स्थान को पहले एल्फिंस्टन सर्कल कहा जाता था। इसका निर्माण 19वीं सदी में हुआ था और इसका नाम उस समय के बॉम्बे के गवर्नर लॉर्ड एल्फिंस्टन के नाम पर रखा गया था।

यह इलाका धीरे-धीरे व्यापार और कारोबार का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। यहां कई ऐतिहासिक इमारतें बनीं, जिनमें ब्रिटिश दौर की वास्तुकला की झलक आज भी देखने को मिलती है। आज भी हॉर्निमन सर्कल मुंबई की ऐतिहासिक विरासत का अहम हिस्सा है।

कौन थे बी. जी. हॉर्निमन?

हॉर्निमन सर्कल का नाम बेंजामिन गाय हॉर्निमन यानी बी. जी. हॉर्निमन के नाम पर रखा गया था। वह ब्रिटिश पत्रकार थे, जो भारत में रहते हुए भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थक बन गए थे।

हॉर्निमन ने प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार द बॉम्बे क्रॉनिकल के संपादक के रूप में काम किया। इस अखबार का कार्यालय एल्फिंस्टन सर्कल के पास स्थित था। उन्होंने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों, भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव और औपनिवेशिक सरकार के दमनकारी रवैये की आलोचना की।

उस दौर में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लिखना आसान नहीं था। इसके बावजूद हॉर्निमन ने भारतीयों के अधिकारों और स्वतंत्रता की मांग को अपनी पत्रकारिता में प्रमुखता दी।

जलियांवाला बाग हत्याकांड की रिपोर्टिंग से आए चर्चा में

बी. जी. हॉर्निमन के पत्रकारिता जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड से जुड़ा है। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल रेजिनाल्ड डायर के आदेश पर जमा हुई निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाई गई थीं। इस घटना में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और देशभर में आक्रोश फैल गया।

उस समय ब्रिटिश सरकार इस घटना की खबरों और सूचनाओं को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी। ऐसे माहौल में हॉर्निमन ने हत्याकांड की जानकारी और उससे जुड़ी रिपोर्टों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पत्रकारिता ने ब्रिटिश शासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन दिया।

ब्रिटिश सरकार ने भारत से कर दिया था निर्वासित

ब्रिटिश शासन की नीतियों के खिलाफ लगातार लिखने के कारण हॉर्निमन सरकार की नजरों में आ गए। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उनकी रिपोर्टिंग और ब्रिटिश शासन की आलोचना के चलते उन्हें 1919 में भारत से निर्वासित कर इंग्लैंड भेज दिया गया।

हालांकि, भारत से बाहर जाने के बाद भी उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करना जारी रखा। उनकी लेखनी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ब्रिटिश शासन की नीतियों और भारत में हो रहे अत्याचारों की ओर ध्यान खींचने में योगदान दिया।

आजादी के बाद हॉर्निमन सर्कल के नाम से मिली पहचान

जब 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, तो स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान देने वाले लोगों को सम्मान देने के प्रयास किए गए। इसी क्रम में मुंबई के एल्फिंस्टन सर्कल का नाम बदलकर हॉर्निमन सर्कल रखा गया। यह नाम उस अंग्रेज पत्रकार के सम्मान में दिया गया, जिसने भारतीयों के अधिकारों और स्वतंत्रता के समर्थन में आवाज उठाई थी।

इस तरह मुंबई की इस ऐतिहासिक जगह का नाम किसी ब्रिटिश शासक के बजाय एक ऐसे पत्रकार के नाम पर पड़ा, जिसने औपनिवेशिक शासन की नीतियों का विरोध किया था।

हॉर्निमन सर्कल की कहानी बताती है कि भारत की आजादी की लड़ाई में योगदान देने वालों की पहचान केवल उनकी राष्ट्रीयता से नहीं, बल्कि उनके विचारों और कामों से भी बनी। आज यह स्थान मुंबई की ऐतिहासिक विरासत के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े एक महत्वपूर्ण अध्याय की याद भी दिलाता है।

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