पुष्कर का इतिहास: दुनिया के प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिरों में शामिल है यह तीर्थ, वीडियो में जानिए धार्मिक मान्यता और पुष्कर मेले की कहानी
राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित पुष्कर भारत के प्राचीन और प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है। अरावली की पहाड़ियों से घिरा यह धार्मिक नगर पवित्र पुष्कर सरोवर, ब्रह्मा मंदिर और हर साल लगने वाले अंतरराष्ट्रीय पुष्कर मेले के लिए जाना जाता है। हिंदू धर्म में पुष्कर को विशेष तीर्थ का दर्जा प्राप्त है। यहां देशभर से श्रद्धालु सरोवर में स्नान करने, मंदिरों में दर्शन करने और धार्मिक अनुष्ठान करने पहुंचते हैं।
पुष्कर की सबसे खास पहचान भगवान ब्रह्मा को समर्पित मंदिर है। आमतौर पर भगवान विष्णु और भगवान शिव के मंदिर अधिक दिखाई देते हैं, जबकि ब्रह्मा जी के मंदिर अपेक्षाकृत कम हैं। इसी वजह से पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से खास महत्व रखता है।
पुष्कर का नाम कैसे पड़ा? कमल के फूल से जुड़ी है पौराणिक कथा
पुष्कर के नाम की उत्पत्ति को लेकर एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, भगवान ब्रह्मा पृथ्वी पर यज्ञ करने के लिए एक उपयुक्त स्थान की तलाश कर रहे थे। इसी दौरान उनके हाथ से कमल का फूल गिरा। जिस स्थान पर फूल गिरा, वहां जल का स्रोत उत्पन्न हुआ और पवित्र पुष्कर सरोवर की उत्पत्ति मानी गई। कमल के फूल से जुड़ी इसी कथा के कारण इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा।राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग की रिपोर्ट में भी इस कथा का उल्लेख मिलता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, पुष्कर को तीन भागों में भी देखा जाता है, जिन्हें ज्येष्ठ पुष्कर, मध्य पुष्कर और कनिष्ठ पुष्कर कहा जाता है।
ब्रह्मा जी के मंदिर से जुड़ी है सावित्री के श्राप की मान्यता
पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर को लेकर एक और लोकप्रिय पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा पुष्कर में यज्ञ कर रहे थे, लेकिन उनकी पत्नी देवी सावित्री समय पर यज्ञ में नहीं पहुंच सकीं। यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकलता देख ब्रह्मा जी ने गायत्री से विवाह करके यज्ञ पूरा किया।कहा जाता है कि इससे नाराज होकर देवी सावित्री ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि उनकी पूजा सीमित स्थानों पर ही होगी। इसी मान्यता के कारण पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर को विशेष महत्व दिया जाता है। हालांकि, यह धार्मिक लोककथा है, प्रमाणित ऐतिहासिक घटना नहीं।
पुष्कर सरोवर को क्यों कहा जाता है तीर्थराज?
पुष्कर सरोवर को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसे ‘तीर्थराज’ यानी तीर्थों का राजा भी कहा जाता है। सरोवर के चारों ओर अनेक मंदिर और 52 स्नान घाट हैं। धार्मिक मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।कार्तिक महीने में पुष्कर सरोवर के घाटों पर श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ उमड़ती है। लोग पूजा-अर्चना करते हैं और अपने परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। सरोवर के आसपास स्थित मंदिर और घाट पुष्कर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
पुष्कर मेला क्यों है दुनिया भर में प्रसिद्ध?
पुष्कर की पहचान यहां लगने वाले वार्षिक पशु मेले से भी है। अक्टूबर और नवंबर के दौरान आयोजित होने वाला पुष्कर मेला ऊंटों और अन्य पशुओं के व्यापार के साथ-साथ राजस्थान की लोकसंस्कृति का बड़ा उत्सव है। मेले में पशुओं की खरीद-बिक्री, पारंपरिक प्रतियोगिताएं, लोक संगीत, हस्तशिल्प और स्थानीय खानपान आकर्षण का केंद्र रहते हैं।कार्तिक पूर्णिमा के आसपास मेले में धार्मिक गतिविधियां भी बढ़ जाती हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु और बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक पुष्कर पहुंचते हैं। यह मेला राजस्थान की ग्रामीण परंपराओं और पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर के अलावा कहां घूम सकते हैं?
पुष्कर आने वाले पर्यटक ब्रह्मा मंदिर और पुष्कर सरोवर के अलावा सावित्री माता मंदिर, वराह मंदिर और रंगजी मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं। सावित्री माता मंदिर पहाड़ी पर स्थित है, जहां से पुष्कर नगर और सरोवर का सुंदर दृश्य दिखाई देता है।पुष्कर जयपुर से लगभग 145 किलोमीटर और अजमेर से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन अजमेर है। पुष्कर राजस्थान की ऐसी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है, जहां पौराणिक मान्यताएं, प्राचीन मंदिर, पवित्र सरोवर और लोकजीवन एक साथ दिखाई देते हैं। भगवान ब्रह्मा के प्रसिद्ध मंदिर और पुष्कर मेले के कारण इस छोटे से तीर्थ नगर की पहचान भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी बनी हुई है।

