लंकाधिपति रावण की तपोभूमि से लेकर मराठो की युद्धभूमि तक, 3 मिनट के इस वीडियो में जाने बीसलपुर बाँध का अनोखा इतिहास
इतिहासकार जितेन्द्र सिंह के अनुसार जयसिंह ने मेवाड़ की राजकुमारी चन्द्र कंवर सिसोदिया से विवाह किया था। तब मेवाड़ के साथ समझौता हुआ कि सिसोदिया रानी का पुत्र जयपुर का राजा बनेगा। इस कारण स्वयं को जयपुर की गद्दी का हकदार मानने वाले माधोसिंह ने अपने सौतेले भाई ईश्वरी सिंह के विरुद्ध युद्ध का मोर्चा खोल दिया। उसने संवत 1804 के फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में मेवाड़ी सेना, मराठों तथा हाड़ौती के बूंदी की संयुक्त सेना के साथ जयपुर पर आक्रमण कर दिया।
मराठा सेना का नेतृत्व खांडेराव होलकर कर रहे थे तथा हाड़ौती की सेना की कमान बूंदी के राव उम्मेद सिंह के पास थी। इस युद्ध में जयपुर की सेना का नेतृत्व प्रमुख दीवान हर गोविंद नट्टानी ने किया था। युद्ध इतिहास में रावल नरेन्द्र सिंह, जोबनेर ने लिखा है कि जयपुर की सेना ने भीलवाड़ा तक शत्रु सेना का पीछा किया। जयपुर विजय के पश्चात ईश्वरी सिंह ने धूमधाम से जयपुर नगर में प्रवेश किया।
रावण बीसलपुर से लाया था कांवड़ : शास्त्रों में मान्यता है कि बीसलपुर बांध के किनारे स्थित गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर ही वह स्थान है, जहां लंका के राजा रावण ने घोर तपस्या की थी। रावण ने इसी स्थान पर भगवान शिव के चरणों में अपने दस सिर अर्पित कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। जितेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों व 108 उप ज्योतिर्लिंगों में बीसलपुर के गोकर्णेश्वर शिव की विशेष मान्यता है। यह भी मान्यता है कि सावन माह में लंका के राजा रावण कांवड़ में नदियों का जल लेकर यहां जलाभिषेक करने आते थे। रावण की कुलदेवी निकुंभला माता का मंदिर भी यहीं पर है।
गौभक्त महात्मा गोकर्ण ने अपने भाई राक्षस घुंधकारी की मोक्ष प्राप्ति की कामना से बीसलपुर में भागवत कथा का आयोजन करवाया था। इसी के चलते इस मंदिर को मोक्ष स्थल मानकर लोग अस्थियों का विसर्जन करते हैं और कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान कर पापों से मुक्ति पाते हैं। अजमेर वंश के चौहान राजा बीसलदेव उर्फ विग्रह राज चतुर्थ ने संवत 1244 में यहां शिव मंदिर की नींव रखी थी। जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई जयसिंह ने गुफा में कलात्मक कांच जड़वाकर मंदिर बनवाया था।
नीलम से बने शिवलिंग की कहानी: बीसलपुर के नीलम शिवलिंग के गायब होने का मामला विधानसभा में काफी सुर्खियों में रहा था। राजधानी जयपुर समेत कई जिलों की प्यास बुझाने वाले बीसलपुर के प्राचीन शिव मंदिर से दुर्लभ नीलम शिवलिंग के गायब होने और दूसरे शिवलिंग की स्थापना का मामला काफी चर्चित रहा था। वर्ष 1987 में यह मुद्दा राजस्थान विधानसभा में उठा था। इस पर सदन में बहस भी हुई थी। उन दिनों अखबारों और जनता के बीच यह मुद्दा काफी चर्चित रहा था।
बीसलपुर के निकट राजमहल में जयपुर की सेना ने मराठों व मेवाड़ की सेना के साथ भीषण युद्ध लड़ा था। इतिहासकार जितेन्द्र सिंह शेखावत के अनुसार महाराजा जयसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद मेवाड़ राजपरिवार ने अपने भतीजे माधोसिंह प्रथम को जयपुर की गद्दी पर आसीन कराने के लिए मराठों व हाड़ौती की संयुक्त सेना के साथ आक्रमण किया था। इस युद्ध में विजय की खुशी में ईश्वरी सिंह ने त्रिपोलिया बाजार में विजय स्तम्भ ईसरलाट का निर्माण कराया था, जिसे आज सरगासूली के नाम से जाना जाता है। जयपुर में ऐसा पहली बार हुआ था, जब स्थानीय सामंतों ने परम्परा अनुसार बड़े पुत्र को राजा बनाने के लिए परिवारजनों व रिश्तेदारों से युद्ध किया था।

