आदमी कमाता है और फिर… अपने परिवार के लिए बचाते-बचाते एक दिन खुद ही खर्च हो जाता है, Video
समाज में अक्सर एक आम आदमी की ज़िंदगी को सिर्फ उसके कमाने की क्षमता से आंका जाता है। वह सुबह घर से निकलता है और रात को लौटता है, बीच में सिर्फ जिम्मेदारियां होती हैं—परिवार की जरूरतें, बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता की दवाइयां और भविष्य की चिंता। वह कमाता है, जोड़ता है, बचाता है… और इसी क्रम में धीरे-धीरे खुद को खर्च करता चला जाता है।
एक आम आदमी शायद ही कभी अपने लिए कुछ सोचता है। उसकी खुशियां परिवार की मुस्कान में सिमट जाती हैं। नए कपड़े, बेहतर खाना, आराम—ये सब सबसे पहले दूसरों के हिस्से में आते हैं। वह खुद पुराने जूते पहन लेता है, लेकिन बच्चों की फीस समय पर भरता है। बीमारी को नजरअंदाज कर काम पर चला जाता है, क्योंकि छुट्टी लेने का मतलब कमाई का नुकसान होता है।
समय के साथ यह त्याग उसकी आदत बन जाता है। वह यह मान लेता है कि उसका काम सिर्फ देना है, मांगना नहीं। लेकिन इसी प्रक्रिया में उसकी सेहत, उसके सपने और उसकी इच्छाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं। जब उम्र ढलती है, तो शरीर जवाब देने लगता है और तब एहसास होता है कि उसने अपने लिए कुछ बचाया ही नहीं।
समाज भी अक्सर इस त्याग को सामान्य मान लेता है। आदमी की थकान, उसका तनाव और उसका अकेलापन शायद ही किसी को दिखाई देता है। उससे उम्मीद की जाती है कि वह मजबूत रहे, शिकायत न करे और हर हाल में जिम्मेदारी निभाता रहे। मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक जरूरतें और आत्मसम्मान जैसे मुद्दे अक्सर उसकी जिंदगी में जगह ही नहीं बना पाते।
विडंबना यह है कि जब वही आदमी टूट जाता है—बीमारी, बेरोजगारी या मानसिक दबाव से—तब लोग कहते हैं कि वह कमजोर पड़ गया। कोई यह नहीं पूछता कि उसने खुद को बचाने के लिए क्या किया, क्योंकि उसे कभी यह सिखाया ही नहीं गया कि खुद पर खर्च करना भी जरूरी है।

