Uttarakhand News: पलायन की मार से खाली होते गांव, अब नेताओं की भी कमी; पौड़ी गढ़वाल में दावेदारों का टोटा
उत्तराखंड में लंबे समय से जारी पलायन का असर अब राजनीतिक गतिविधियों पर भी दिखाई देने लगा है। पहाड़ों से लगातार लोगों के मैदानी क्षेत्रों और दूसरे राज्यों की ओर जाने के कारण कई इलाकों में आबादी कम हुई है। इसका असर अब स्थानीय राजनीति में भी देखने को मिल रहा है। स्थिति यह है कि कई जगहों पर राजनीतिक दलों को चुनावी मैदान में उतारने के लिए पर्याप्त दावेदार तक नहीं मिल पा रहे हैं।
बताया जा रहा है कि इस समस्या का सबसे ज्यादा असर पौड़ी गढ़वाल में दिखाई दे रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के कारण कई गांवों में आबादी का दबाव कम हुआ है। बड़ी संख्या में युवा रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, दिल्ली-एनसीआर समेत अन्य शहरों की ओर चले गए हैं। ऐसे में गांवों में राजनीतिक गतिविधियों और चुनावी भागीदारी पर भी इसका असर पड़ रहा है।
स्थानीय स्तर पर चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों की संख्या कम होने से राजनीतिक दलों के सामने उम्मीदवार चयन की चुनौती खड़ी हो रही है। जिन क्षेत्रों में पहले चुनाव के दौरान कई दावेदार सामने आते थे, वहां अब संभावित प्रत्याशियों की संख्या सीमित होती जा रही है। इसके पीछे पलायन को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
खाली होते गांवों का राजनीति पर असर
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पलायन कोई नई समस्या नहीं है। रोजगार और शिक्षा के सीमित अवसर, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा बुनियादी सुविधाओं की चुनौतियों के कारण लंबे समय से लोग शहरों की ओर जा रहे हैं। कई गांवों में घर तो मौजूद हैं, लेकिन उनमें रहने वाले लोगों की संख्या लगातार घट रही है।
पौड़ी गढ़वाल जैसे जिलों में इसका असर अधिक दिखाई देता है। बड़ी संख्या में लोग रोजगार और अन्य अवसरों के लिए मैदानी क्षेत्रों में बस गए हैं। ऐसे में स्थानीय चुनावों में सक्रिय भागीदारी करने वाले लोगों की संख्या भी प्रभावित हुई है।
राजनीतिक दलों के लिए उम्मीदवारों की तलाश अब केवल चुनावी रणनीति का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह पहाड़ों से घटती आबादी की एक तस्वीर भी सामने रखती है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है और दावेदारों की संख्या चुनाव तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है।
पलायन रोकना बड़ी चुनौती
उत्तराखंड में पलायन को रोकने के लिए सरकारों की ओर से रोजगार, पर्यटन, स्वरोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कई प्रयास किए जाते रहे हैं। इसके बावजूद पर्वतीय क्षेत्रों से लोगों के बाहर जाने की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा लगातार होती रही है कि पहाड़ों में रोजगार और बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराए बिना पलायन की समस्या को स्थायी रूप से रोकना मुश्किल होगा। मौजूदा स्थिति में राजनीतिक दावेदारों की कमी का मुद्दा भी इसी व्यापक जनसांख्यिकीय बदलाव से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

