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ग्लेशियरों की संख्या बढ़ी, फिर भी घट रहा बर्फ का क्षेत्रफल, वीडियो में जाने 30 साल में 11.6% सिकुड़ा हिंदू कुश हिमालय

ग्लेशियरों की संख्या बढ़ी, फिर भी घट रहा बर्फ का क्षेत्रफल, वीडियो में जाने 30 साल में 11.6% सिकुड़ा हिंदू कुश हिमालय

हिमालय के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। इसका असर सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में पानी की उपलब्धता, नदियों के प्रवाह और हिमालयी क्षेत्रों में आपदा के खतरे पर भी पड़ सकता है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी ICIMOD के 1990 से 2020 तक के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट में हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों में बड़े बदलाव सामने आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 1990 से 2020 के बीच पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल 11.6 प्रतिशत घट गया। खास बात यह है कि 2010 के बाद ग्लेशियरों के सिकुड़ने की रफ्तार औरतेज हुई है। इसका मतलब है कि तापमान बढ़ने और बदलते मौसम का असर ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में भी साफ दिखाई दे रहा है।

ग्लेशियरों की संख्या बढ़ी, फिर भी बर्फ क्यों घट रही?

ग्लेशियरों से जुड़ा सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि कई इलाकों में ग्लेशियरों की संख्या बढ़ी है, लेकिन उनका कुल बर्फीला क्षेत्रफल कम हो गया। इसकी मुख्य वजह ग्लेशियरों का टुकड़ों में बंटना है।जब किसी बड़े ग्लेशियर का आकार लगातार कम होता है तो वह कई छोटे हिस्सों में विभाजित हो सकता है। सैटेलाइट तस्वीरों में ये अलग-अलग ग्लेशियर के रूप में दर्ज हो सकते हैं। इस तरह ग्लेशियरों की गिनती बढ़ती दिखाई देती है, लेकिन वास्तव में कुल जमा बर्फ और ग्लेशियर का क्षेत्रफल लगातार घट रहा होता है।यानी सिर्फ ग्लेशियरों की संख्या देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हिमालय में बर्फ बढ़ रही है। असली तस्वीर जानने के लिए उनके कुल क्षेत्रफल और बर्फ की मात्रा को देखना जरूरी है।

2010 के बाद बढ़ी पिघलने की रफ्तार

रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि ग्लेशियरों के सिकुड़ने की प्रक्रिया 1990 के दशक से जारी थी, लेकिन 2010 के बाद इसमें तेजी आई। बढ़ता तापमान, बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव और लंबे समय तक गर्म मौसम ग्लेशियरों के लिए चुनौती बन रहे हैं।ग्लेशियरों पर जमा बर्फ जब गर्मियों में तेजी से पिघलती है और उसकी भरपाई सर्दियों में होने वाली बर्फबारी से पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पाती, तो ग्लेशियर का संतुलन बिगड़ जाता है। लंबे समय तक ऐसा होने पर ग्लेशियर पीछे हटने लगता है और उसका क्षेत्रफल कम होता जाता है।

ऊंचाई के साथ बदल रही है ग्लेशियरों की स्थिति

ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन का असर हर ऊंचाई पर एक जैसा नहीं है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी बर्फ और ग्लेशियरों में बदलाव दर्ज किए गए हैं, लेकिन कई जगहों पर मध्यम और अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाले ग्लेशियर ज्यादा तेजी से पीछे हट रहे हैं।ऊंचाई कम होने पर तापमान अपेक्षाकृत ज्यादा रहता है, जिससे बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इसके अलावा ग्लेशियर की सतह पर जमा धूल और काला कार्बन सूर्य की गर्मी को ज्यादा अवशोषित करते हैं, जिससे बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है।

उत्तराखंड के ऊपरी गंगा क्षेत्र की स्थिति चिंताजनक

उत्तराखंड के लिए भी आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक ऊपरी गंगा क्षेत्र में 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 18.6 प्रतिशत कम हुआ है।उत्तराखंड में गंगा की प्रमुख सहायक नदियों और उनसे जुड़े जलस्रोतों के लिए हिमालयी ग्लेशियर बेहद महत्वपूर्ण हैं। इन ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में योगदान देता है। इसलिए ग्लेशियरों में लंबे समय तक होने वाला बदलाव भविष्य में जल उपलब्धता के स्वरूप को प्रभावित कर सकता है।

बर्फ पिघलने से बढ़ सकता है आपदा का खतरा

ग्लेशियरों के सिकुड़ने का एक दूसरा पहलू हिमालयी आपदाओं से जुड़ा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई जगह नई ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं। यदि ऐसी झीलों में पानी तेजी से बढ़े और प्राकृतिक बांध टूट जाए तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा पैदा हो सकता है।इसके अलावा तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव से भूस्खलन, अचानक बाढ़ और पहाड़ी क्षेत्रों में अन्य आपदाओं का जोखिम भी प्रभावित हो सकता है।

सिर्फ बर्फ का पिघलना नहीं, पानी के भविष्य का सवाल

हिमालय को एशिया के प्रमुख जलस्रोतों में गिना जाता है। यहां के ग्लेशियर कई बड़ी नदियों के जल प्रवाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए ग्लेशियरों का लगातार सिकुड़ना सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह पानी, खेती, बिजली उत्पादन और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा है।हालांकि ग्लेशियरों का पिघलना एक प्राकृतिक प्रक्रिया भी है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान दौर में जलवायु परिवर्तन इसके स्वरूप और गति को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में हिमालयी ग्लेशियरों की लगातार निगरानी, बेहतर सैटेलाइट मैपिंग और संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना बेहद जरूरी हो गया है।

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