उत्तराखंड की 18 नदियों पर रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा, वीडियो में जाने रिस्पना के 100 ML पानी में 24 लाख से ज्यादा मल बैक्टीरिया
उत्तराखंड की गंगा और यमुना समेत 18 प्रमुख नदी प्रणालियों को लेकर हुए एक शोध में नदियों की बिगड़ती सेहत की गंभीर तस्वीर सामने आई है। शोध के मुताबिक सीवर, कचरा, बढ़ता पर्यटन, औद्योगिक गतिविधियां और खेती से निकलने वाला प्रदूषण राज्य की नदियों पर लगातार दबाव बढ़ा रहा है। देहरादून की रिस्पना नदी प्रदूषण की गंभीर स्थिति का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है।शोध में रिस्पना नदी के 100 मिलीलीटर पानी में 24 लाख से ज्यादा मल वाले बैक्टीरिया पाए गए। यह आंकड़ा नदी में सीवर और गंदे पानी के पहुंचने की गंभीर स्थिति को दर्शाता है। रिस्पना लंबे समय से शहरी प्रदूषण की मार झेल रही है और नए अध्ययन ने इसकी स्थिति को और चिंताजनक बताया है।
नैनीताल की नंधौर नदी पर भी औद्योगिक गतिविधियों का असर सामने आया। शोध के मुताबिक नदी के आसपास करीब 73 उद्योगों के कचरे का दबाव देखा गया। इससे नदी के पानी की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। वहीं गंगा, यमुना और कोसी जैसी प्रमुख नदियों में भी गंदे पानी और बढ़ती मानवीय गतिविधियों का प्रभाव पाया गया।यह शोध वर्ष 2026 में डिस्कवर हैजार्ड्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड की 18 नदी प्रणालियों से जुड़े अध्ययनों की समीक्षा की। इसके लिए वर्ष 2001 से 2022 के बीच प्रकाशित 88 शोधपत्रों का अध्ययन किया गया। इन शोधपत्रों में 34 देशों की नदी प्रणालियों और भारत की 36 प्रमुख नदियों से संबंधित अध्ययन भी शामिल थे।
रिसर्च में शहरीकरण, सीवर व्यवस्था, पर्यटन, औद्योगिक गतिविधियों और कृषि से नदियों के पानी पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि उत्तराखंड में तेजी से बढ़ता शहरीकरण और पर्यटन नदी प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है। बड़ी संख्या में पर्यटकों के आने से कचरा और सीवेज बढ़ता है, जबकि कई जगहों पर इसका उचित निस्तारण नहीं हो पाता।अध्ययन में अलकनंदा नदी को लेकर भी चिंता जताई गई है। शोधकर्ताओं को अलकनंदा के पानी में प्लास्टिक के बेहद छोटे कण यानी माइक्रोप्लास्टिक के पहुंचने के प्रमाण मिले हैं। इसका मतलब है कि प्रदूषण अब केवल दिखाई देने वाले कचरे तक सीमित नहीं है, बल्कि पानी में ऐसे सूक्ष्म कण भी पहुंच रहे हैं, जो जलीय जीवन और मानव स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन सकते हैं।
हरिद्वार की गंगा को लेकर भी शोध में गंभीर संकेत मिले हैं। यहां पानी में 49 तरह के बैक्टीरिया पाए गए, जिनमें से 20 पर एक एंटीबायोटिक का असर नहीं हुआ। यह एंटीबायोटिक प्रतिरोध की समस्या की ओर इशारा करता है। यानी नदी प्रदूषण अब सिर्फ गंदगी और बदबू की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि इसके साथ स्वास्थ्य और रोगाणुरोधी प्रतिरोध जैसी गंभीर चुनौतियां भी जुड़ रही हैं।शोधकर्ताओं के निष्कर्ष बताते हैं कि उत्तराखंड की नदियों को बचाने के लिए केवल सफाई अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। सीवर प्रबंधन, औद्योगिक कचरे की निगरानी, पर्यटन गतिविधियों का बेहतर नियमन और कृषि से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना भी जरूरी होगा। नदियों की नियमित वैज्ञानिक निगरानी और प्रदूषण के स्रोतों पर कार्रवाई के बिना इन जलस्रोतों की स्थिति में सुधार करना मुश्किल हो सकता है।

