हाई कोर्ट में पूर्व विधायक को फटकार, जज बोले- ‘ये फिल्म नहीं चल रही, कोर्ट है’
उत्तराखंड हाई कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान उस समय दिलचस्प लेकिन गंभीर स्थिति बन गई, जब अदालत ने पूर्व भाजपा विधायक राजेश शुक्ला को कड़ी फटकार लगा दी। कोर्ट की टिप्पणी “ये फिल्म नहीं चल रही, कोर्ट है” अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई है। अदालत की नाराजगी के बाद पूर्व विधायक को माफी तक मांगनी पड़ी।
जानकारी के अनुसार मामले की सुनवाई के दौरान राजेश शुक्ला अदालत में अपनी बात जोरदार अंदाज में रखने की कोशिश कर रहे थे। बताया जा रहा है कि सुनवाई के दौरान उनका व्यवहार और बोलने का तरीका अदालत की मर्यादा के अनुरूप नहीं माना गया। इसी पर नाराजगी जताते हुए न्यायाधीश ने सख्त टिप्पणी कर दी।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत कोई फिल्मी मंच नहीं है, जहां संवादबाजी या नाटकीय अंदाज में बातें की जाएं। अदालत की गरिमा और प्रक्रिया का सम्मान करना सभी के लिए जरूरी है। न्यायाधीश की इस टिप्पणी के बाद कोर्ट रूम का माहौल कुछ देर के लिए शांत हो गया।
सूत्रों के मुताबिक अदालत की फटकार के बाद राजेश शुक्ला ने तुरंत अपने व्यवहार पर खेद जताया और कोर्ट से माफी मांगी। इसके बाद मामला शांत हुआ और सुनवाई आगे बढ़ी। हालांकि कोर्ट की यह टिप्पणी अब राजनीतिक और कानूनी गलियारों में चर्चा का बड़ा विषय बन चुकी है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत में अनुशासन और मर्यादा सबसे महत्वपूर्ण होती है। चाहे कोई आम नागरिक हो या बड़ा नेता, सभी को कोर्ट की प्रक्रिया और नियमों का पालन करना पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार न्यायपालिका हमेशा अदालत की गरिमा बनाए रखने को लेकर बेहद सख्त रहती है।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग कोर्ट की सख्ती की सराहना कर रहे हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक नेताओं के बढ़ते आक्रामक व्यवहार से जोड़कर देख रहे हैं। सोशल मीडिया पर “ये फिल्म नहीं चल रही, कोर्ट है” वाली टिप्पणी तेजी से वायरल हो रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को अदालत जैसे संवेदनशील स्थानों पर ज्यादा संयम और गंभीरता दिखानी चाहिए। क्योंकि उनकी हर गतिविधि का असर आम जनता पर भी पड़ता है।
फिलहाल उत्तराखंड हाई कोर्ट की यह टिप्पणी पूरे राज्य में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। अदालत की सख्त फटकार ने यह साफ कर दिया है कि न्यायालय में अनुशासन और सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं होता।

