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हिमालय में 221 ग्लेशियल झीलें बनीं खतरा, वीडियो में जाने फटीं तो 6 राज्यों के 39 जिलों पर पड़ेगा असर

हिमालय में 221 ग्लेशियल झीलें बनीं खतरा, वीडियो में जाने फटीं तो 6 राज्यों के 39 जिलों पर पड़ेगा असर

नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों के बढ़ते खतरे की ओर ध्यान खींचा है। इसी बीच देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान समेत तीन संस्थानों की नई रिसर्च सामने आई है। अध्ययन में हिमालय क्षेत्र में 221 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है, जिनके अचानक फटने पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF आ सकता है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इन झीलों में पानी का दबाव बढ़ने, भूस्खलन या बर्फ के बड़े हिस्से के झील में गिरने जैसी घटनाओं से अचानक बांध टूट सकता है। ऐसी स्थिति में बेहद तेज रफ्तार से पानी नीचे की ओर आने पर नदी घाटियों और आसपास के इलाकों में भारी तबाही हो सकती है।

कोसी और ऊपरी सिंधु घाटियां सबसे संवेदनशील

रिसर्च में कोसी, यारलुंग जांगबो, मानस और ऊपरी सिंधु नदी घाटियों को सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में रखा गया है। इन क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पीछे हटने के कारण कई नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलों का आकार भी बढ़ रहा है।ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ग्लेशियल झीलों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है। ऐसे में झीलों के किनारे बने प्राकृतिक बांध कमजोर होने पर GLOF का खतरा पैदा होता है।

भारत के 3 बड़े हिमालयी क्षेत्र संवेदनशील

भारत में भी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम की कई नदी घाटियों को संवेदनशील जोन में रखा गया है। यहां ग्लेशियल झीलों की निगरानी और उनके जलस्तर में होने वाले बदलाव पर लगातार नजर रखना जरूरी माना जा रहा है।अध्ययन के अनुसार यदि संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में से किसी में अचानक टूटने की घटना होती है, तो इसका असर 6 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 39 जिलों तक पहुंच सकता है।तेज बहाव अपने रास्ते में आने वाली चट्टानों, मलबे, पेड़ों और मिट्टी को साथ बहाकर नीचे के इलाकों में पहुंचा सकता है। इससे पुल, सड़क, बिजली परियोजनाओं और नदी किनारे बसे गांवों को गंभीर नुकसान हो सकता है।

उत्तराखंड में हैंगिंग ग्लेशियर भी खतरा

उत्तराखंड के लिए खतरा सिर्फ ग्लेशियल झीलों तक सीमित नहीं है। यहां पहाड़ों की खड़ी ढलानों पर मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर भी चिंता का विषय हैं।हैंगिंग ग्लेशियर पहाड़ी ढलानों पर अस्थिर स्थिति में मौजूद बर्फ के बड़े हिस्से होते हैं। इनके टूटकर नीचे गिरने से बर्फ, चट्टान और मलबा तेजी से नीचे आ सकता है। यदि ऐसा मलबा किसी ग्लेशियल झील में गिरता है तो झील का पानी अचानक बाहर निकलने का खतरा और बढ़ सकता है।

नेपाल की बाढ़ ने बढ़ाई चिंता

26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास आई अचानक बाढ़ के बाद इस तरह के खतरों पर चर्चा और तेज हो गई है। हिमालय में बदलते तापमान, ग्लेशियरों के पीछे हटने और ग्लेशियल झीलों के विस्तार को देखते हुए वैज्ञानिक लंबे समय से शुरुआती चेतावनी प्रणाली और नियमित निगरानी की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हिमालय का बड़ा हिस्सा बेहद दुर्गम है। कई झीलों तक जमीन के रास्ते पहुंचना मुश्किल है। ऐसे में सैटेलाइट निगरानी, रिमोट सेंसिंग और सेंसर आधारित शुरुआती चेतावनी प्रणाली भविष्य में GLOF के खतरे को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते ग्लेशियल बदलाव यह संकेत दे रहे हैं कि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए सिर्फ बाढ़ आने के बाद राहत अभियान पर्याप्त नहीं होगा। संवेदनशील झीलों और ग्लेशियरों की पहले से पहचान कर उनकी लगातार निगरानी करना जरूरी है।

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