1200 जेन-जी डॉक्टर 7 सितंबर से करेंगे हड़ताल, कम स्टाइपेंड को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा
देश में डॉक्टरों की नई पीढ़ी से जुड़ा विरोध अब सोशल मीडिया से निकलकर सड़क तक पहुंचने जा रहा है। करीब 1200 जेन-जी डॉक्टर 7 सितंबर से हड़ताल पर जाने की तैयारी में हैं। डॉक्टरों का आरोप है कि उन्हें उनकी मेहनत और जिम्मेदारियों के मुकाबले बेहद कम स्टाइपेंड दिया जा रहा है। इसी मुद्दे को लेकर डॉक्टरों ने सरकार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया है।
डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक काम करने, मरीजों की जिम्मेदारी संभालने और लगातार ड्यूटी के बावजूद उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहायता नहीं मिल रही है। कम स्टाइपेंड का मुद्दा लंबे समय से डॉक्टरों के बीच नाराजगी का कारण बना हुआ है। अब यही नाराजगी सोशल मीडिया पर चल रही मुहिम से आगे बढ़कर आंदोलन का रूप ले रही है।
सोशल मीडिया से शुरू हुई मुहिम अब सड़क पर
स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर डॉक्टरों ने पहले सोशल मीडिया के जरिए अपनी आवाज उठाई। बड़ी संख्या में डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने अपनी समस्याएं साझा करते हुए सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। डॉक्टरों का कहना है कि ऑनलाइन विरोध के बावजूद जब उनकी मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई तो उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।
7 सितंबर से हड़ताल का ऐलान
डॉक्टरों ने 7 सितंबर से हड़ताल पर जाने की घोषणा की है। इस दौरान बड़ी संख्या में डॉक्टरों के शामिल होने की संभावना है। हड़ताल के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है। हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि उनकी मांगों को गंभीरता से लिया जाए और सरकार जल्द बातचीत कर समाधान निकाले।
कम स्टाइपेंड बना मुख्य मुद्दा
डॉक्टरों का सबसे बड़ा विरोध कम स्टाइपेंड को लेकर है। उनका कहना है कि मेडिकल क्षेत्र में प्रशिक्षण और काम के दौरान उन्हें काफी दबाव और जिम्मेदारियों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद मिलने वाला स्टाइपेंड उनकी जरूरतों के अनुरूप नहीं है।
डॉक्टरों ने भाजपा सरकार से स्टाइपेंड की व्यवस्था की समीक्षा करने और उसे बढ़ाने की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि डॉक्टरों के सम्मान और उनके काम की उचित मान्यता से भी जुड़ा हुआ है।
अब सभी की नजर 7 सितंबर से शुरू होने वाले इस आंदोलन पर है। अगर सरकार और डॉक्टरों के बीच समय रहते बातचीत नहीं होती है, तो हड़ताल आगे भी जारी रह सकती है और इसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ सकता है।

