⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा निर्णय: शादी का वादा पूरा न करना स्वतंत्र व्यक्ति की सहमति वाली शारीरिक संबंध के बाद अपराध नहीं
उत्तर प्रदेश की Allahabad High Court ने एक अहम कानूनी आदेश में कहा है कि किसी व्यक्ति द्वारा लंबे समय तक सहमति पर आधारित शारीरिक संबंध बनाने के बाद शादी के वादे को पूरा न करना, आपराधिक अपराध नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने इस तरह के मामलों को सीधे दुष्कर्म (रैप) या अन्य आपराधिक आरोपों के दायरे में नहीं लाने का रुख अपनाया है, जब तक यह सिद्ध न हो कि पूरा झूठ करते हुए शुरुआत से ही धोखे (दुरुपयोग) का उद्देश्य था।
इस आदेश में जस्टिस अवनीश सक्सेना की बेंच ने कहा कि अगर दो पढ़े‑लिखे वयस्क लोग लंबे समय तक शारीरिक संबंध में रहे हैं और बाद में शादी का वादा टूट गया है, तो उसे स्वतंत्र सहमति से ज्यादा गंभीर अपराध नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थितियों में आपराधिक केस को आगे बढ़ाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है।
✔️ मुख्य बिंदु:
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कोर्ट ने मामले की जांच और चार्जशीट/समन जारी आदेशों को रद्द कर दिया, क्योंकि तथ्यों के अनुसार ऐसा नहीं लगता था कि आरोपी ने शुरुआत में ही धोखे से शादी का वादा किया था और फिर शारीरिक संबंध के लिए धोखा किया।
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कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि इस मामले में पीड़ित और आरोपी के बीच लंबे समय तक संबंध रहे और दोनों के बीच खुश‑मिज़ाज समझ बनी रही।
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सिर्फ़ शादी न होना या रिश्ते का टूटना रैप जैसा गंभीर अपराध सिद्ध नहीं करता, जब तक शुरुआत से धोखे का इरादा साबित न हो।
⚖️ ये फैसला क्यों अहम है?
इस निर्णय का असर उन कई कानूनी मामलों पर पड़ेगा जहां व्यक्ति ने कहा कि किसी ने शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाया और बाद में उस वादे को पूरा नहीं किया — और इसके आधार पर वह दुष्कर्म, छल या अन्य आपराधिक धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करवाता है। कोर्ट का रुख यह स्पष्ट कर रहा है कि हर जिन रिश्तों में शादी या संबंध टूटते हैं, उन्हें आपराधिक रूप से नहीं जोड़ा जा सकता।
📌 महत्वपूर्ण धारणा:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस फैसले में स्वतंत्रता और सहमति को प्रमुख स्थान दिया और कहा कि कानून को केवल रिश्तों के टूटने पर लागू अपराध के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह निर्णय भारतीय न्यायिक सोच में व्यक्तिगत संबंधों और आपराधिक कानून के बीच स्पष्ट अंतर को प्रकाशित करता है।

