रूस की नीना ने ऑनलाइन कराया काशी में नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध, पिता समेत युद्ध में मारे लोगों के मोक्ष की कामना
काशी की धार्मिक परंपराओं और सनातन संस्कृति से प्रभावित रूस की निवासी नीना ने अपने पिता एंड्रे की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए वाराणसी के पिशाचमोचन तीर्थ में धार्मिक अनुष्ठान कराया। खास बात यह रही कि नीना खुद रूस में मौजूद थीं और उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से काशी में चल रहे पूरे अनुष्ठान में सहभागिता की। उनके साथ उनकी मित्र ईन्गा भी ऑनलाइन जुड़ी रहीं।
नीना ने केवल अपने पिता के लिए ही नहीं, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध में मारे गए लोगों की आत्माओं की शांति और मोक्ष की कामना से भी यह धार्मिक विधान कराया। काशी में उनकी ओर से प्रतिनिधि नीलकान्त दुबे मौजूद रहे और उन्होंने अनुष्ठान की धार्मिक प्रक्रियाओं में भाग लिया।
पिशाचमोचन तीर्थ में हुआ नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध
बताया गया कि पिशाचमोचन तीर्थ में अनुष्ठान दो चरणों में संपन्न कराया गया। सबसे पहले नारायण बलि का विधान हुआ। इसके बाद त्रिपिंडी श्राद्ध कराया गया। पूरा धार्मिक अनुष्ठान पं. आशापति शास्त्री के निर्देशन में संपन्न हुआ, जबकि पं. संजय कुमार उपाध्याय के आचार्यत्व में अन्य आचार्यों ने विधि-विधान पूरा कराया।
रिपोर्ट के अनुसार, नीना ने पिछले महीने अपनी रूसी शिष्या ईन्गा के माध्यम से पं. आशापति शास्त्री से संपर्क किया था। उनकी इच्छा थी कि सनातन परंपरा के अनुसार उनके पिता और युद्ध में जान गंवाने वाले लोगों के लिए आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से धार्मिक अनुष्ठान कराया जाए।
काशी नहीं आ सकीं तो ऑनलाइन जुड़कर निभाई सहभागिता
नीना के लिए रूस से वाराणसी पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में उन्होंने ऑनलाइन माध्यम को सहारा बनाया। रूस में रहते हुए वह वीडियो कॉल के जरिए काशी में चल रहे धार्मिक अनुष्ठान को देखती रहीं और अपनी मित्र ईन्गा के साथ उसमें ऑनलाइन सहभागी बनीं। वहीं, उनके प्रतिनिधि ने काशी में मौजूद रहकर धार्मिक प्रक्रिया पूरी कराई।
यह मामला इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें आधुनिक तकनीक और प्राचीन धार्मिक परंपरा का अनोखा मेल देखने को मिला। हजारों किलोमीटर दूर रूस में मौजूद रहने के बावजूद नीना ने काशी की धार्मिक परंपरा के जरिए अपने पिता और युद्ध में मारे गए लोगों के लिए प्रार्थना की।
पिशाचमोचन तीर्थ का धार्मिक महत्व
पं. आशापति शास्त्री के अनुसार, काशी का पिशाचमोचन तीर्थ पितरों की शांति और मोक्ष की कामना से किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी धार्मिक आस्था के चलते नीना ने भी यहां नारायण बलि और त्रिपिंडी श्राद्ध कराने का निर्णय लिया।
इस अनुष्ठान में व्यक्तिगत दुख के साथ मानवीय संवेदना का भाव भी जुड़ा रहा। नीना ने अपने पिता एंड्रे की आत्मा की शांति के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध में जान गंवाने वाले अन्य लोगों के लिए भी मोक्ष और शांति की कामना की।
विदेशों तक पहुंच रही काशी की धार्मिक परंपरा
इस घटना ने एक बार फिर काशी की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं की अंतरराष्ट्रीय पहुंच को सामने रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित संस्था सनातन परंपरा, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार के लिए कई देशों में काम करने का दावा करती है।
रूस से ऑनलाइन जुड़ी नीना और काशी में मौजूद उनके प्रतिनिधि के जरिए संपन्न हुआ यह अनुष्ठान दिखाता है कि आधुनिक डिजिटल माध्यमों के जरिए भी लोग अपनी धार्मिक आस्था और परंपराओं से जुड़े रह सकते हैं। पिता की आत्मा की शांति से लेकर युद्ध में मारे गए लोगों के मोक्ष तक, नीना की यह पहल धार्मिक आस्था के साथ मानवीय संवेदना का भी उदाहरण बनी।

