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डायबिटीज मरीजों के लिए राहत की खबर! कम ग्लाइसेमिक लोड वाले आटे से डेढ़ साल में HbA1c में बड़ा सुधार, 512 मरीजों पर हुई स्टडी

डायबिटीज मरीजों के लिए राहत की खबर! कम ग्लाइसेमिक लोड वाले आटे से डेढ़ साल में HbA1c में बड़ा सुधार, 512 मरीजों पर हुई स्टडी

आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज से टाइप-2 डायबिटीज मरीजों को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन सामने आया है। स्टडी में कम ग्लाइसेमिक लोड वाले आटे के सेवन को ब्लड शुगर नियंत्रण में सुधार से जोड़ा गया है। करीब डेढ़ साल तक चले इस अध्ययन में 512 टाइप-2 डायबिटीज मरीजों को शामिल किया गया। अध्ययन के दौरान मरीजों के औसत HbA1c स्तर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज होने का दावा किया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, अध्ययन की शुरुआत में मरीजों का औसत HbA1c करीब 8.68 प्रतिशत था। डेढ़ साल के फॉलोअप के बाद यह घटकर लगभग 6.50 प्रतिशत रह गया। HbA1c को आमतौर पर पिछले करीब दो से तीन महीनों के औसत ब्लड ग्लूकोज स्तर का आकलन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए इसमें आई कमी को अध्ययन में बेहतर शुगर नियंत्रण का संकेत माना गया।

512 मरीजों पर हुआ अध्ययन

अध्ययन में टाइप-2 डायबिटीज से जूझ रहे 512 मरीजों को शामिल किया गया था। मरीजों को कम ग्लाइसेमिक लोड वाले आटे से तैयार भोजन लेने की सलाह दी गई और उनकी स्थिति पर लंबे समय तक नजर रखी गई। शोध के दौरान ब्लड शुगर और HbA1c जैसे मानकों में बदलाव का आकलन किया गया।

अध्ययन में करीब 15 प्रतिशत मरीजों की दवाएं बंद होने की बात भी सामने आई है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि डायबिटीज के हर मरीज को आटे में बदलाव करने के बाद दवा की जरूरत नहीं रहेगी। दवा बंद करने का निर्णय केवल डॉक्टर की निगरानी और मरीज की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

क्या होता है ग्लाइसेमिक लोड?

ग्लाइसेमिक लोड किसी भोजन का ब्लड शुगर पर पड़ने वाला संभावित प्रभाव समझने का एक तरीका है। इसमें भोजन में मौजूद कार्बोहाइड्रेट की मात्रा और उसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स दोनों महत्वपूर्ण होते हैं। कम ग्लाइसेमिक लोड वाले भोजन से रक्त में ग्लूकोज का बढ़ना अपेक्षाकृत नियंत्रित रह सकता है।

डायबिटीज के मरीजों के लिए भोजन का चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण होता है क्योंकि कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन ब्लड शुगर को प्रभावित करता है। हालांकि, केवल किसी एक खाद्य पदार्थ या आटे को डायबिटीज का इलाज मानना उचित नहीं है।

दवा छोड़ना खुद से न करें

स्टडी के नतीजे उत्साहजनक जरूर बताए जा रहे हैं, लेकिन मरीजों को इन्हें डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं मानना चाहिए। डायबिटीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें भोजन, शारीरिक गतिविधि, वजन, दवाएं और जीवनशैली सभी मिलकर ब्लड शुगर नियंत्रण में भूमिका निभाते हैं।

अगर किसी मरीज का HbA1c बेहतर हो रहा है तो डॉक्टर उसकी दवाओं की खुराक में बदलाव कर सकते हैं या कुछ मामलों में दवा बंद करने का निर्णय भी ले सकते हैं। लेकिन बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा बंद करना खतरनाक हो सकता है।

स्टडी से क्यों बढ़ी उम्मीद?

टाइप-2 डायबिटीज के बढ़ते मामलों के बीच भोजन आधारित हस्तक्षेपों को लेकर लगातार शोध हो रहे हैं। कम ग्लाइसेमिक लोड वाले आटे पर हुए इस अध्ययन में HbA1c में आई गिरावट ने यह संभावना जरूर दिखाई है कि भोजन की गुणवत्ता और कार्बोहाइड्रेट का चयन शुगर मैनेजमेंट में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

हालांकि, किसी भी अध्ययन के परिणामों को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले उसकी पद्धति, आटे की सटीक संरचना, मरीजों की अन्य जीवनशैली आदतों और लंबे समय के परिणामों को देखना जरूरी होता है।

एसएन मेडिकल कॉलेज की इस स्टडी में 512 मरीजों के आंकड़ों और करीब 18 महीने के फॉलोअप से सामने आए परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। HbA1c का 8.68 प्रतिशत से 6.50 प्रतिशत तक आना अध्ययन में बड़ा बदलाव है। लेकिन डायबिटीज मरीजों के लिए सबसे जरूरी संदेश यही है कि खानपान में बदलाव विशेषज्ञ की सलाह से करें और दवाओं को अपने स्तर पर बंद न करें।

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