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KGMU हॉस्टल में नॉन-वेज बैन पर सियासत तेज, सपा ने बताया ‘तुगलकी फरमान’, BJP पर साधा निशाना

KGMU हॉस्टल में नॉन-वेज बैन पर सियासत तेज, सपा ने बताया ‘तुगलकी फरमान’, BJP पर साधा निशाना

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के हॉस्टलों में नॉन-वेज खाने पर रोक को लेकर अब राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस फैसले को लेकर भाजपा सरकार और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल पर निशाना साधा है। सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने इस आदेश को ‘तुगलकी फरमान’ बताते हुए सवाल उठाए हैं।

सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने बुधवार को बयान जारी कर कहा कि हॉस्टल में खाने को लेकर इस तरह का आदेश छात्रों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की विचारधारा के अनुसार अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रुख अपनाया जाता है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के कई नेता मछली-भात खाते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में आने के बाद उनकी सोच बदल जाती है।

‘क्या बंगाल में मछली खाने वालों पर भी लगेगा प्रतिबंध?’

फखरुल हसन चांद ने भाजपा नेताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो भाजपा सांसद बंगाल में मछली-भात खाते हैं, क्या उनके लिए भी कोई ऐसा आदेश जारी किया जाएगा? उन्होंने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का नाम लेते हुए कहा कि क्या ऐसा निर्देश दूसरे राज्यों के लिए भी दिया जाएगा या यह केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित रहेगा।

उन्होंने कहा कि भोजन व्यक्ति की निजी पसंद का विषय है और किसी पर अपनी पसंद थोपना उचित नहीं है। सपा नेता ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार ऐसे फैसलों के जरिए लोगों की स्वतंत्रता को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है।

KGMU हॉस्टल में नॉन-वेज पर रोक का मामला

दरअसल, KGMU के हॉस्टलों में नॉन-वेज भोजन को लेकर एक आदेश जारी किया गया था, जिसके बाद यह मामला चर्चा में आ गया। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से हॉस्टल मेस में नॉन-वेज पर रोक लगाने की बात सामने आई थी। इसके बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस मुद्दे पर बहस शुरू हो गई।

कुछ लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर फैसले का समर्थन किया, जबकि कई छात्रों और राजनीतिक दलों ने इसे खाने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए विरोध जताया।

भाजपा और विपक्ष के बीच बढ़ा विवाद

इस मामले ने एक बार फिर भाजपा और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी को तेज कर दिया है। सपा ने जहां इसे सरकार की सोच से जोड़ते हुए हमला बोला है, वहीं भाजपा समर्थक इसे विश्वविद्यालय प्रशासन का आंतरिक निर्णय बता रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में खान-पान और सांस्कृतिक मुद्दे अक्सर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में KGMU हॉस्टल का यह मामला भी अब केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सियासी मुद्दा बन गया है।

फिलहाल KGMU प्रशासन की ओर से इस विवाद पर विस्तृत राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि विश्वविद्यालय इस फैसले को लेकर कोई नया स्पष्टीकरण जारी करता है या नहीं।

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