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मथुरा में 5 पीढ़ियों से रावण के पुतले बना रहा मुस्लिम परिवार, जाहिद बोले- कमाई नहीं, भगवान की सेवा है

मथुरा में 5 पीढ़ियों से रावण के पुतले बना रहा मुस्लिम परिवार, जाहिद बोले- कमाई नहीं, भगवान की सेवा है

उत्तर प्रदेश के मथुरा में सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करने वाला एक परिवार सामने आया है। यहां एक मुस्लिम परिवार पिछले पांच पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाने का काम कर रहा है। परिवार के सदस्य जाहिद का कहना है कि उनके लिए यह केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि भगवान की सेवा है। उन्होंने यह कला अपने दादा-परदादा से सीखी और अब उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

दशहरे के अवसर पर रावण के पुतले तैयार करने की इस परंपरा के जरिए परिवार अपनी विरासत को सहेज रहा है। यह काम धार्मिक आयोजन से जुड़ा होने के साथ-साथ पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी का भी उदाहरण है।

दादा-परदादा से सीखी पुतले बनाने की कला

जाहिद के मुताबिक, उनके परिवार में रावण के पुतले बनाने का काम कई पीढ़ियों से होता आ रहा है। उन्होंने अपने बुजुर्गों को यह काम करते देखा और उनसे ही इसकी बारीकियां सीखीं। समय के साथ उन्होंने भी इस कला में महारत हासिल की और परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाया।

रावण का पुतला तैयार करना मेहनत और हुनर का काम है। इसके लिए ढांचे को तैयार करने से लेकर उसे आकार देने और सजाने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। पुतले को आकर्षक और मजबूत बनाने के लिए कारीगरों को काफी समय और मेहनत लगानी पड़ती है।

‘कमाई नहीं, भगवान की सेवा है’

जाहिद का कहना है कि उनके लिए यह काम सिर्फ पैसे कमाने का साधन नहीं है। वह इसे भगवान की सेवा और अपने पूर्वजों की विरासत मानते हैं। इसी सोच के साथ वह हर साल दशहरे के आयोजन के लिए रावण के पुतले तैयार करते हैं।

उनकी यह भावना दिखाती है कि पारंपरिक कारीगरी और धार्मिक आयोजनों में भागीदारी कई बार सामाजिक और सांस्कृतिक सीमाओं से आगे बढ़कर आपसी सहयोग का रूप ले लेती है।

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल

मथुरा में मुस्लिम परिवार का पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाना धार्मिक सद्भाव और साझा सांस्कृतिक परंपराओं की चर्चा को भी सामने लाता है। दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है और इस अवसर पर देश के अलग-अलग हिस्सों में रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

ऐसे आयोजनों के लिए पुतले बनाने वाले कारीगरों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। उनकी मेहनत से ही उत्सव की तैयारियां पूरी होती हैं और परंपराएं आगे बढ़ती हैं।

पीढ़ियों से सहेज रहे हैं विरासत

जाहिद और उनका परिवार अपने बुजुर्गों से मिली कला को आगे बढ़ाकर न केवल पारिवारिक परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों में भी योगदान दे रहा है। पांच पीढ़ियों से जारी यह काम इस बात का उदाहरण है कि हुनर, परंपरा और आपसी सम्मान समाज को जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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