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काशी में पूर्णिमा पर भव्य अनुष्ठान, 84 घाटों के गंगा जल से भगवान जगन्नाथ का अभिषेक

काशी में पूर्णिमा पर भव्य अनुष्ठान, 84 घाटों के गंगा जल से भगवान जगन्नाथ का अभिषेक

ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि पर काशी एक बार फिर भक्ति और आस्था के रंग में रंगी नजर आई। आज पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ का 84 घाटों से लाए गए गंगा जल से विधि-विधानपूर्वक अभिषेक किया गया। इस अनूठे आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया और पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।

हर वर्ष की तरह इस बार भी गर्मी और तपिश से राहत देने के प्रतीकात्मक भाव के साथ भक्तों ने भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का गंगा जल से स्नान कराया। मान्यता है कि इस विशेष स्नान के बाद भगवान भक्तों के कष्ट हरते हैं और नगर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

गंगा जल से शीतलता प्रदान करने की परंपरा

श्रद्धालुओं का मानना है कि ज्येष्ठ माह की तेज गर्मी में भगवान जगन्नाथ को गंगा जल से स्नान कराने की परंपरा अत्यंत प्राचीन और पवित्र है। काशी के 84 घाटों से विशेष रूप से एकत्र किया गया जल इस अनुष्ठान को और भी विशिष्ट बनाता है। भक्त इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति सेवा और समर्पण का प्रतीक मानते हैं।

सुबह से ही घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। गंगा स्नान के बाद जल कलशों में भरकर मंदिर परिसर तक लाया गया और मंत्रोच्चार के बीच भगवान का अभिषेक संपन्न कराया गया।

भक्तों में गहरी आस्था और उत्साह

पूरे आयोजन के दौरान “जय जगन्नाथ” के जयकारों से वातावरण गूंजता रहा। श्रद्धालुओं का कहना है कि यह परंपरा केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। कई भक्तों ने इसे जीवन में सुख-शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बताया।

अगले दिन ‘आराम’ की मान्यता

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अगले दिन “अस्वस्थ” माने जाते हैं और उन्हें विश्राम दिया जाता है। इसी कारण मंदिरों में अगले दिन दर्शन परंपरागत रूप से सीमित रहते हैं। भक्त इस अवधि को भगवान के विश्राम काल के रूप में देखते हैं।

काशी में संपन्न यह अनुष्ठान एक बार फिर आस्था, परंपरा और धार्मिक भावनाओं की गहराई को दर्शाता है, जिसमें जनमानस की श्रद्धा और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला।

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