पराली जलाने के प्रभाव: वायु प्रदूषण के साथ क्षेत्रीय जलवायु और तापमान पर भी असर
कृषि क्षेत्र में पराली जलाना केवल वायु प्रदूषण का कारण नहीं बनता, बल्कि यह क्षेत्रीय जलवायु और जमीनी तापमान को भी प्रभावित करता है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि पराली जलाने की प्रथा से ग्लोबल वार्मिंग के क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ते हैं और पर्यावरणीय असंतुलन पैदा होता है।
अध्ययन के अनुसार, पराली जलाने से न केवल धुआं और हानिकारक गैसें वातावरण में फैलती हैं, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता और स्थानीय तापमान पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। शोधकर्ताओं ने बताया कि लगातार पराली जलाने के कारण स्थानीय तापमान में वृद्धि होती है और वायु की नमी कम हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप क्षेत्रीय जलवायु बदलने लगती है और फसल उत्पादन पर भी असर पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने की यह प्रथा मुख्यतः उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में आम है। इसके कारण केवल शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण नहीं बढ़ता, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और पर्यावरणीय असंतुलन देखने को मिलता है। शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि पराली जलाने से निकलने वाला धुआं स्मॉग और प्रदूषण स्तर बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाता है।
अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि पराली प्रबंधन को सतत और पर्यावरण-मित्र विकल्पों के साथ अपनाना आवश्यक है। विशेषज्ञों ने किसानों को सुझाव दिया कि वे पराली को कम्पोस्ट, जैविक खाद या बायोगैस उत्पादन के लिए इस्तेमाल करें। इस प्रकार न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी, बल्कि किसानों को आर्थिक लाभ भी मिलेगा।
शोधकर्ता डॉ. रचना मिश्रा ने कहा, “पराली जलाना केवल प्रदूषण की समस्या नहीं है। यह क्षेत्रीय जलवायु और मिट्टी के तापमान पर भी प्रभाव डालता है। अगर हम इसे नियंत्रित नहीं करेंगे, तो ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव और गंभीर हो सकते हैं। इसलिए पराली प्रबंधन पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।”
अध्यान में यह भी दिखाया गया है कि जमीनी तापमान में बढ़ोतरी और स्थानीय मौसम में बदलाव से फसल की पैदावार पर भी असर पड़ सकता है। लगातार पराली जलाने से मिट्टी में पोषक तत्व कम हो जाते हैं और फसलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
सरकारी और गैर-सरकारी संगठन किसानों को पराली प्रबंधन के लिए तकनीकी प्रशिक्षण दे रहे हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को जागरूक करना और पर्यावरण-मित्र विकल्पों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ, तो न केवल वायु प्रदूषण कम होगा बल्कि क्षेत्रीय जलवायु पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
इस अध्ययन के परिणाम यह संकेत देते हैं कि पराली जलाना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि कृषि और जलवायु संकट का कारण भी बन सकता है। सतत और जिम्मेदार प्रबंधन के माध्यम से इस समस्या का समाधान संभव है।

