डायबिटीज सिर्फ जीवनशैली नहीं, आनुवांशिक भी हो सकती है, केजीएमयू ने टाइप-2 मधुमेह से जुड़े जीन की पहचान की
डायबिटीज को अब तक मुख्य रूप से जीवनशैली से जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन अब इससे जुड़े आनुवांशिक पहलुओं पर भी वैज्ञानिक मुहर लगने लगी है। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के शोधकर्ताओं ने खून में मौजूद ऐसे विशेष जीन की पहचान की है, जो टाइप-2 मधुमेह (डायबिटीज) के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। यह खोज डायबिटीज की समय रहते पहचान और बेहतर उपचार की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
केजीएमयू के विशेषज्ञों के अनुसार, टाइप-2 डायबिटीज अब केवल गलत खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता और मोटापे तक सीमित नहीं है। शोध में यह स्पष्ट हुआ है कि कुछ लोगों में यह बीमारी आनुवांशिक कारणों से भी विकसित हो सकती है। यानी अगर परिवार में पहले से किसी को डायबिटीज है, तो अगली पीढ़ी में इसके होने का खतरा अधिक हो सकता है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि इस अध्ययन के दौरान मरीजों के रक्त नमूनों की गहन जांच की गई। इसमें ऐसे विशेष जीन पाए गए, जो इंसुलिन के स्राव और शरीर में शुगर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं। जब ये जीन असंतुलित या सक्रिय रूप से कार्य नहीं करते, तो व्यक्ति में टाइप-2 डायबिटीज विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है।
केजीएमयू के वरिष्ठ चिकित्सकों का कहना है कि यह शोध भविष्य में डायबिटीज के अर्ली डिटेक्शन यानी शुरुआती पहचान में अहम भूमिका निभा सकता है। अगर किसी व्यक्ति में यह जीन पहले से मौजूद पाया जाता है, तो समय रहते जीवनशैली में बदलाव और निगरानी के जरिए बीमारी को रोका या नियंत्रित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में डायबिटीज के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में आनुवांशिक कारणों की पहचान बेहद जरूरी हो जाती है। उन्होंने बताया कि कई बार लोग स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के बावजूद डायबिटीज का शिकार हो जाते हैं, जिसका कारण अब तक स्पष्ट नहीं हो पाता था। यह शोध ऐसे मामलों को समझने में मदद करेगा।
डॉक्टरों ने यह भी स्पष्ट किया कि आनुवांशिक जोखिम होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से डायबिटीज होगी। सही खान-पान, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण और नियमित स्वास्थ्य जांच से इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केजीएमयू का यह शोध न केवल चिकित्सा जगत के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि आम लोगों को भी जागरूक करने वाला है। इससे यह संदेश मिलता है कि डायबिटीज से बचाव के लिए सिर्फ जीवनशैली ही नहीं, बल्कि पारिवारिक स्वास्थ्य इतिहास पर भी ध्यान देना जरूरी है।
केजीएमयू प्रशासन का कहना है कि आगे चलकर इस शोध के आधार पर और व्यापक अध्ययन किए जाएंगे, जिससे डायबिटीज की रोकथाम और उपचार के नए रास्ते खुल सकें। यह खोज भारत में बढ़ते मधुमेह संकट से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

