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पहलगाम से ध्यान हटाने के लिए चला जाति जनगणना कार्ड, भारत-पाक तनाव के बीच संजय राउत का दावा

पहलगाम से ध्यान हटाने के लिए चला जाति जनगणना कार्ड, भारत-पाक तनाव के बीच संजय राउत का दावा

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने जाति आधारित जनगणना को मंजूरी देकर बड़ा ट्रंप कार्ड खेला है. कांग्रेस पार्टी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार जातीय जनगणना की मांग कर रहे थे. वहीं, बिहार की सियासत में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव भी जातीय जनगणना कराने की मांग कर रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार ने जातीय जनगणना कराने का ऐलान कर कांग्रेस और आरजेडी से उनका मुद्दा छीन लिया है और अब विपक्षी पार्टियों को जातीय जनगणना को लेकर अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा.

पिछले कुछ वर्षों से राहुल गांधी और विपक्षी दल लगातार जातिगत जनगणना की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बना रहे थे. राहुल गांधी ने अपने भाषणों और अभियानों में कई बार यह कहा कि उनकी सरकार बनने पर जातिगत जनगणना कराई जाएगी और आरक्षण की 50% सीमा को तोड़ा जाएगा, लेकिन अब मोदी सरकार ने यह कदम उठाकर विपक्ष की रणनीति को कमजोर कर दिया है.

क्या है जाति जनगणना?
जातिगत जनगणना में देश के नागरिकों की जाति के आधार पर आंकड़े इकट्ठा किए जाएंगे. इससे यह पता चलेगा कि किस जाति की जनसंख्या कितनी है और किन वर्गों को अब तक सामाजिक लाभ नहीं मिल पाया है. यह जनगणना पहली बार औपचारिक रूप से केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी, जबकि अब तक केवल सामाजिक-आर्थिक जनगणना ही होती रही है.

कांग्रेस-विपक्ष की धार कुंद करने की कोशिश
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी ने कांग्रेस की धार को कुंद करने की कोशिश की है. बीजेपी की ओर से कहा गया है कि कांग्रेस की सरकारों ने आज तक जाति जनगणना का विरोध किया है. आजादी के बाद की सभी जनगणनाओं मेंजातियों की गणना नहीं की गयी. बीजेपी ने इसे लेकर कैंपेन करना शुरू कर दिया है.

बीजेपी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस ने कभी भी जातियों की सही गणना कराने की मंशा नहीं दिखाई. पार्टी का आरोप है कि 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने लोकसभा में यह जरूर कहा था कि जाति जनगणना पर कैबिनेट में विचार किया जाएगा, लेकिन इसके बाद सिर्फ एक मंत्रिमंडलीय समूह का गठन हुआ, जिसकी सिफारिशों के बावजूद कांग्रेस सरकार ने जातिगत आंकड़े इकट्ठा करने के बजाय केवल एक सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण (SECC) कराया.

बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के अन्य दल अब इस मुद्दे को सिर्फ राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि सत्ता में रहते हुए उन्होंने कभी इस पर ठोस कदम नहीं उठाया.

भाजपा ने संकेत दिया है कि वह इस नैरेटिव को पूरे देश में लेकर जाएगी और कांग्रेस की “दोगली नीति” को जनता के सामने उजागर करेगी. बिहार जैसे राज्य में, जहां जातिगत समीकरण चुनावी नतीजों को गहराई से प्रभावित करते हैं, यह मुद्दा खासा प्रभाव डाल सकता है.

जातीय जनगणना पर राहुल के बयान से मचा था बवाल
हाल में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि बिहार में जाति जनगणना का उद्देश्य “लोगों को मूर्ख बनाना” कहा था. 18 जनवरी को पटना में कांग्रेस के संविधान सुरक्षा सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा था कि हम बिहार की तरह जाति जनगणना नहीं करेंगे, जिसका उद्देश्य लोगों को मूर्ख बनाना था. हम ऐसा इसलिए करेंगे ताकि हमें प्रत्येक क्षेत्र में जाति समूहों की सही हिस्सेदारी पता चल सके. गांधी ने जोर देकर कहा कि उनकी पार्टी 50% आरक्षण कोटा सीमा को तोड़ने के पक्ष में है.

राहुल गांधी की टिप्पणियों ने राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया था. उनके सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने उनकी टिप्पणियों का बचाव करते हुए कहा कि उनका मतलब केवल यह पूछना था कि बिहार सरकार के नवंबर 2023 के फैसले में विभिन्न जाति समूहों के लिए कोटा 50% से बढ़ाकर 65% करने का फैसला संविधान की नौवीं अनुसूची में क्यों नहीं शामिल किया गया, जिससे इसे कानूनी जांच से बचाया जा सकता था.

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