इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: ट्रांसजेंडर और साथी की लिव-इन रिलेशनशिप को संरक्षण
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्ति और उसके साथी के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी संरक्षण प्रदान किया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों वयस्कों को अपनी पसंद से साथ रहने का पूर्ण अधिकार है और उनके निजी जीवन में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होगा।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है, जिसकी रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से साथ रहना चाहते हैं तो परिवार या समाज को उनके जीवन में दखल देने का अधिकार नहीं है।
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि उनके परिवार के सदस्य और कुछ अन्य लोग उनके संबंध का विरोध कर रहे हैं तथा उन्हें धमकियां दी जा रही हैं। इस पर कोर्ट ने पुलिस प्रशासन को निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता सुरक्षा की मांग करें तो उन्हें तत्काल संरक्षण उपलब्ध कराया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसके मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता। संविधान सभी नागरिकों को समानता, गरिमा और स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
यह फैसला ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और वयस्कों के आपसी सहमति से बने संबंधों में बाहरी हस्तक्षेप असंवैधानिक है।
फिलहाल, कोर्ट के आदेश के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि वे स्थिति पर नजर रखें और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई करें। इस निर्णय को व्यक्तिगत अधिकारों और समानता के सिद्धांत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

