Samachar Nama
×

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 23 साल बाद पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में आरोपी को किया बरी, न्याय व्यवस्था पर उठाए सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 23 साल बाद पत्नी और तीन बच्चों की हत्या के मामले में आरोपी को किया बरी, न्याय व्यवस्था पर उठाए सवाल

उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका ने एक 23 साल पुराने हत्या मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस शख्स को बरी कर दिया है, जिस पर अपनी पत्नी और तीन बच्चों की हत्या का आरोप था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी की गलती साबित नहीं कर सका, इसलिए उसे निर्दोष माना गया।

यह फैसला जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की दो-जजों की बेंच ने 16 फरवरी, 2026 को सुनाया। बेंच ने कहा कि इस मामले ने हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था पर दुखद टिप्पणी की है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में इतने लंबे समय तक न्याय न मिलना गंभीर चिंता का विषय है और इसे सुधारने की तत्काल जरूरत है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्याय व्यवस्था में सुधार आवश्यक है। बेंच ने यह सुझाव दिया कि जजों की संख्या बढ़ाना, उनके सहायक स्टाफ को मजबूत करना और अदालतों के लिए आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराना आज सबसे जरूरी कदम हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल सम्मेलन और बैठकें करने से न्याय व्यवस्था की स्थिति में सुधार नहीं होगा, बल्कि ठोस कदम उठाना जरूरी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायपालिका की धीमी कार्यप्रणाली और केसों के लंबित रहने की समस्या को उजागर करता है। 23 साल तक आरोपी को जेल में रखना और बाद में उसे बरी करना न केवल आरोपी के जीवन पर गहरा असर डालता है, बल्कि यह सामाजिक विश्वास और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है।

वकीलों का कहना है कि इस तरह के मामले यह दर्शाते हैं कि न्यायिक प्रक्रियाओं में लंबित मामलों की संख्या कम करना और तेज निर्णय लेना कितना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अगर अदालतों में पर्याप्त संख्या में जज और स्टाफ हों, तो न केवल केसों का निपटारा समय पर होगा, बल्कि समाज में न्याय पर भरोसा भी बढ़ेगा।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह मामला न्याय व्यवस्था में सुधार की महत्वपूर्ण चेतावनी है। उनका कहना है कि लंबे समय तक किसी व्यक्ति को जेल में रखना और बाद में बरी करना इंसानियत और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से भी चिंताजनक है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल, केस प्रबंधन प्रणाली का सुधार और पर्याप्त प्रशिक्षण वाले स्टाफ की नियुक्ति जैसी ठोस पहल की जानी चाहिए। ऐसा करने से लंबित मामलों की संख्या कम होगी और फैसले समय पर आएंगे।

फैसले के बाद आरोपी को जेल से रिहा कर दिया गया है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यह निर्णय सिर्फ तथ्यों और सबूतों के आधार पर लिया गया है। न्यायपालिका का मानना है कि भविष्य में ऐसे मामलों में सुधारात्मक कदम उठाने से ही हमारे न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखी जा सकती है।

इस मामले ने पूरे समाज और कानूनी विशेषज्ञों के बीच यह संदेश दिया है कि न्यायपालिका में सुधार और संरचनात्मक बदलाव अब और टालने योग्य नहीं हैं। जजों, स्टाफ और संसाधनों की कमी सीधे तौर पर लंबित मामलों और न्याय में देरी के रूप में सामने आती है, जिसका असर आम जनता पर भी पड़ता है।

Share this story

Tags