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यूपी विधान परिषद में पांच दशक बाद शिक्षक गुट का सफाया, माध्यमिक शिक्षक संघ का खाता नहीं खुला

यूपी विधान परिषद में पांच दशक बाद शिक्षक गुट का सफाया, माध्यमिक शिक्षक संघ का खाता नहीं खुला

उत्तर प्रदेश की विधान परिषद के चुनाव में शिक्षक संगठनों को बड़ा झटका लगा है। दशकों तक शिक्षक राजनीति में दबदबा रखने वाले माध्यमिक शिक्षक संघ के किसी भी गुट को इस बार सफलता नहीं मिली। करीब पांच दशक बाद सदन में शिक्षक संघों का पुराना प्रभाव पूरी तरह खत्म होता दिखाई दे रहा है। कभी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखने वाले संगठनों के उम्मीदवार इस बार कई सीटों पर मुकाबले में भी नहीं टिक सके।

छह शिक्षक सीटों पर नहीं खुला खाता

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों के चुनाव में छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों पर भी मुकाबला हुआ। इन सीटों पर माध्यमिक शिक्षक संघ के अलग-अलग गुटों ने अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन कोई भी उम्मीदवार जीत हासिल नहीं कर सका। कई सीटों पर संघ के प्रत्याशियों को बेहद कम वोट मिले, जिससे उनके पुराने वोट बैंक और संगठनात्मक ताकत पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

माध्यमिक शिक्षक संघ के चंदेल, पांडेय और अन्य गुटों ने अलग-अलग सीटों पर अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। वाराणसी खंड शिक्षक सीट से चंदेल गुट के प्रदेश अध्यक्ष चेतनारायण सिंह को 3,471 वोट मिले, जबकि पांडेय गुट के प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र कुमार पटेल को 1,088 मत ही प्राप्त हुए। लखनऊ सीट पर भी संघ के प्रत्याशी मतदाताओं का भरोसा जीतने में नाकाम रहे।

ओमप्रकाश शर्मा के दौर का अंत

शिक्षक राजनीति में माध्यमिक शिक्षक संघ के शर्मा गुट का लंबे समय तक दबदबा रहा। दिवंगत शिक्षक नेता ओमप्रकाश शर्मा मेरठ-सहारनपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से आठ बार विधान परिषद सदस्य चुने गए थे। उन्होंने लगभग 48 वर्षों तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया और शिक्षक राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।

हालांकि, वर्ष 2020 के चुनाव में उन्हें भाजपा प्रत्याशी श्रीचंद शर्मा से हार का सामना करना पड़ा था। अब 2026 के चुनाव में भी शर्मा गुट किसी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सका। इस तरह लंबे समय तक विधान परिषद में प्रतिनिधित्व करने वाले इस संगठन का सदन में खाता बंद हो गया है।

बदल गई शिक्षक राजनीति की तस्वीर

इस चुनाव के नतीजे बताते हैं कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में अब पुराने संगठनों की पकड़ पहले जैसी नहीं रह गई है। भाजपा और समाजवादी पार्टी जैसे राजनीतिक दलों ने इन सीटों पर अपनी ताकत बढ़ाई है। शिक्षक संगठनों के सामने अब अपने समर्थकों को एकजुट रखने, संगठन को मजबूत करने और नई पीढ़ी के शिक्षकों को नेतृत्व में जगह देने की चुनौती है।

शिक्षक संगठनों के उम्मीदवारों की हार के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या शिक्षक राजनीति अब पारंपरिक संघों से निकलकर सीधे राजनीतिक दलों के प्रभाव में जा रही है। हालांकि, चुनाव परिणामों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि शिक्षक संगठनों का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया है, लेकिन विधान परिषद में उनका प्रतिनिधित्व खत्म होना उनके लिए गंभीर राजनीतिक झटका जरूर है।

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