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‘स्त्री केवल शरीर नहीं, सृजन की दिव्य चेतना है’ — संविधान क्लब में गुलाब कोठारी का प्रेरणादायक संबोधन

‘स्त्री केवल शरीर नहीं, सृजन की दिव्य चेतना है’ — संविधान क्लब में गुलाब कोठारी का प्रेरणादायक संबोधन

नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित संविधान क्लब में एक विशेष कार्यक्रम के दौरान स्त्री चेतना, भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन पर गहन विचार-विमर्श देखने को मिला। इस अवसर पर वरिष्ठ विचारक और लेखक Gulab Kothari ने अपने संबोधन में कहा कि स्त्री केवल शरीर नहीं, बल्कि सृजन की दिव्य चेतना है, जो समाज और सृष्टि दोनों के संतुलन का आधार है।

यह कार्यक्रम Constitution Club of India में आयोजित किया गया, जहां देशभर से आए बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य विषय भारतीय संस्कृति में स्त्री की भूमिका और आधुनिक समाज में उसकी स्थिति पर केंद्रित रहा।

अपने संबोधन में गुलाब कोठारी ने कहा कि भारतीय दर्शन में स्त्री को हमेशा शक्ति, सृजन और करुणा के प्रतीक के रूप में देखा गया है। उन्होंने कहा कि आज के समय में स्त्री को केवल सामाजिक या भौतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और दार्शनिक स्तर पर समझने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, स्त्री ऊर्जा वह आधार है जो जीवन को जन्म देती है और उसे दिशा प्रदान करती है।

उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिकता के दौर में कई बार स्त्री की वास्तविक भूमिका को सीमित दृष्टिकोण से देखा जाता है, जबकि भारतीय परंपरा में उसे ‘शक्ति’ और ‘प्रकृति’ का स्वरूप माना गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समाज के विकास के लिए स्त्री और पुरुष दोनों की ऊर्जा का संतुलित उपयोग आवश्यक है।

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित विद्वानों ने भी इस विषय पर अपने विचार साझा किए। चर्चा में यह बात सामने आई कि स्त्री सशक्तिकरण केवल आर्थिक या सामाजिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे आत्मिक और सांस्कृतिक सम्मान के स्तर पर भी समझा जाना चाहिए।

कई वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि भारतीय संस्कृति में स्त्री को देवी के रूप में पूजने की परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहरे दार्शनिक अर्थों को समेटे हुए है। इस दृष्टिकोण को आधुनिक जीवन में भी समझने और अपनाने की आवश्यकता है।

कार्यक्रम में युवाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही, जिन्होंने स्त्री अधिकारों, शिक्षा और समानता पर अपने विचार रखे। इस अवसर पर यह भी चर्चा हुई कि समाज में संतुलन और समरसता तभी संभव है जब स्त्री को केवल भूमिका नहीं, बल्कि पूर्ण चेतना के रूप में स्वीकार किया जाए।

कुल मिलाकर, संविधान क्लब में हुआ यह आयोजन स्त्री की भूमिका को नए दृष्टिकोण से समझने और समाज में उसके महत्व को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।

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